Tuesday, 30 January 2024

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु

सैयद परवेज़

बीते सितम्बर 2023 र्मैंने हरियाणा के सोहना जिले में स्थित धम्म सोताकेंद्र में 10 दिवसीय विपश्यना ध्यान साधना शिविर में भाग लिया था। इस केंद्र में भगवान बुद्धद्वारा खोजी गयी विपश्यना विद्या सिखाई जाती है। यह भारत से लुप्त हो चुकी एक विद्या है, जिसे सत्यनारायण गोयनका (19242013) ने बर्मा (म्यांमार) में खोजा और जनसामान्य के लिए सुलभ कराया। उन्होंने सयाजी उ बा खिनसे 14 वर्षों तक विपश्यना की शिक्षा ग्रहण की, और सन् 1969 से अपने जीवनपर्यंत, भारत सहित अनेक देशों में जाकर इस विद्या से लोगों को अवगत करवाया है। साथ ही, इस विद्या को सिखाने के लिए उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी भाषा में अपने ऑडियो और वीडियो भी तैयार किये हैं। उस धम्म सोताकेन्द्र में ध्यान साधना के सहायक आचार्य श्री आर. एन. गौतम थे, जो प्रत्येक साधकों को क्रमानुसार बुलाकर विपश्यना की विधि को समझा भी रहे थे, लेकिन उनका मुख्य कार्य, दिवगंत गुरु गोयनका के ऑडियो को चालू और बंद करना ही था। मुझे तो वह ऑडियो अपने आप में एक सशक्त एवं जीवंत-सी लगी। शिविर में आर्य मौन का कड़ाई से पालन करने की हिदायत थी।

इन दस दिनों में एक गृहस्थ व्यक्ति, भिक्षु और भिक्षुणी का जीवन जीते हुए विपश्यना साधना में रहता है। भिक्षुऔर भिक्षुणीसंस्कृत भाषा का शब्द है जिसे पाली भाषा में भिक्खुऔर भिक्खुनीकहते हैं। क्योंकि उनका वहाँ न तो अपना भोजन होता है, न ही अपना ठिकाना। वहाँ सब कुछ दूसरों का है, भिक्षु और भिक्षुणी-सा जीवन उनके अहम् भाव को खत्म करने में सहायक होता है। गुरुद्वारों की पंक्तियों में बैठकर जब मैंने एक बार लंगर चखा, वहां पर देखा कि जब तक कोई व्यक्ति अपना हाथ फैलाकर रोटी नहीं मांगता है, लंगर परोसने वाले उसे रोटी नहीं देते हैं, मुझे लगा कि यह तो भीख मांगना-सा हो गया। उस समय मैंने पता किया कि यह तो प्रसाद है, जिसे हाथ बढ़ाकर ही लेना होता है। लेकिन विपश्यना में मुझे एहसास हुआ कि इसका भाव भी व्यक्ति के अहम् भाव को समाप्त करना ही होता है।

अहम् और संदेह को खत्म करने के लिए गांधीजी अपने जंतर में कहते हैं कि तुम्हें एक जन्तर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तब यह कसौटी अजमाओ, जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।बुद्ध की परम्परा में देखें तो सत्य और अंहिसाको गांधीजी ने आत्मसात किया। उन्होंने उसे अपने जीवन का एक अंग बना लिया। विपश्यना व्यक्ति की बौद्धिकता के साथ मानवीय पक्ष को अभ्यास के माध्यम जीवन्त रखती है। अभ्यास न करने से पढ़ी हुयी बात का भूल जाना उसका स्वभाव है।

विपश्यना शिविर में जो भोजन साधक के पात्र में उपलब्ध होता है वो उसकी अपनी इच्छा जैसा नहीं होता है। सुबह साढ़े छह बजे नाश्ता, सुबह 11 बजे भोजन, शाम पांच बजे हल्का नाश्ता। इसमें हम देखते हैं कि एक साधक 12 घंटे का उपवास करता है, वो सिर्फ पानी पी सकता है लेकिन उसे भोजन सात बजे के बाद नहीं मिलेगा। जो पुराने साधक होते हैं उन्हें तो शाम के वक्त सिर्फ निम्बू पानी मिलता है।  

यहाँ आर्य मौनका पालन किया जाता है। मन में आया कि यह आर्य मौन क्या है? मौन ही पर्याप्त था। लेकिन यहाँ आकर पता चला कि मौन तो सिर्फ वाणी का होता है किंतु आर्य मौनसम्पूर्ण मौन होता है जिसमें इशारे या किसी भी संकेत तक के माध्यम से संवाद की मनाही होती है। आर्यपाली भाषा के अरियेका शब्द है जिससे बाद में वह आर्य बन गया। जबकि वर्तमान परिपेक्ष्य में आर्यशब्द का अपना अलग अर्थ है। हम देखते हैं कि समाज में एक तरफ आर्यहैं दूसरी तरफ अनार्यहैं। जैसे सवर्णहैं जो वर्ण-व्यवस्था को मानते हैं, दूसरी तरफ अवर्णहैं जोकि वर्ण-व्यवस्था को नहीं मानते हैं। उत्तराखंड में दलित समाज के वे लोग जो आर्य समाजका अनुसरण करते हैं। वे अपने नाम के साथ आर्यालगाते हैं। ध्यातव्य है कि आर्य और आर्या में भी अंतर है।




विपश्यना केंद्र में साधक/साधिकाओं के अलग-अलग शिविर हैं। वहाँ एक पगोड़ा है, जोकि एक तरफ पुरुषों तथा दूसरी तरफ महिलाओं के लिए दो भागों में विभक्त है, इसके अन्दर छोटे-छोटे कमरे हैं। यह पगोड़ा गोलाई में बना हुआ है, इसके छत के ऊपर सात लम्बी शिखर नुमा और एक कुछ बड़ी मोटी गोलाई में शिखर है। यह आठ शिखर जो अष्टांगिक (आठ अंगों वाला) मार्ग का सूचक है यानी सही दृष्टि, सही संकल्प, सही वचन, सही कर्म, सही जीविका, सही प्रयत्न, सही स्मृति, सही समाधि। पगोड़ा साधना का वो शून्यगार होता है जहाँ पर साधक-साधिका बिलकुल एकांत में साधना करते हैं।

शिविरों में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग धम्म हॉल हैं। धम्म हॉल, ध्यान करने का सामूहिक स्थल होता है। धम्म हॉल में साधक को धम्म सेवकों या सहायक आचार्य से कम शब्दों में कुछ पूछने की अनुमति होती है। धम्म सेवक भी एक साधक होता है, लेकिन वह अपनी साधना के साथ अन्य साधकों के लिए भी सेवा कार्य करता है। जैसे उनको सुबह उठाने, ब्रेक के दौरान घण्टी बजाकर धम्म हाल में आने का संकेत देना, साथ ही, भोजनालय में साधकों को भोजन, दूध आदि उनके पात्रों में देना। यदि किसी साधक को कुछ आवश्यकता है, तो वे उन्हें लिखकर देते हैं, जिनका वो प्रबन्ध करते हैं। केन्द्र में प्रत्येक साधकों के लिए अलग-अलग कमरे होते हैं, जिसमें वे विश्राम और अपनी साधना का अभ्यास करते हैं। उन्हें वहाँ भी आर्य मौन का पालन करना होता है। उन्हें किसी भी साधक से बात करने की अनुमति नहीं होती है। साधकों के लिए विपश्यना का केंद्र एक तपोभूमि होती है, जहाँ वो 9 दिनों में लगभग 110 घंटे ध्यान एवं मौन साधना करते हैं, जिससे उनमें ऊर्जा का संचार करता है। केंद्र में साधकों के लिए एक निश्चित सीमा रेखा खींची गयी है, जिसका उल्लंघन करने की मनाही थी। जिस दिन मैं वहाँ पहुंचा, शाम 6 बजे मुझे हल्का नाश्ता प्राप्त हुआ। और शाम सात बजे वहाँ की प्रबन्धक टीम से शिविर के अनुशासन, साथ ही अपने पठन और लेखन सामग्री, मंत्राभिषिक्त माला-कंठी, गंडा-ताबीज, नशीली वस्तुएं बीड़ी, तम्बाकू, कीमती सामान, मोबाइल फोन आदि को जमा करने का निर्देश मिला। साधक के रूकने, भोजन करने, और धम्म हॉल और पगोड़ा में ध्यान करने का एक निश्चित स्थान दिया गया। उस दिन, रात्रि 8 बजे से आर्य मौन के साथ ही शिविर का प्रारम्भ हो गया था।

पहले दिन की साधना में साधक अपने शरीर में प्रतिक्षण होने वाले परिवर्तन का तथागत रूप से अनुभव करने का प्रयास करता है। उसका श्वास (ब्रीथिंग) कैसे प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है। व्यक्ति को अपने श्वास पर बगैर कुछ छेड़छाड़ किये उसे अनुभव करना होता है। इस विपश्यना विद्या को आज से 2500 वर्ष पहले सिद्धार्थ गौतम ने खोज की और बुद्ध बने। ध्यातव्य है कि इस विपश्यना में साधना करने वाले को बगैर किसी ईश्वर का नाम लिए उसे अपना ध्यान सिर्फ श्वासपर केन्द्रित करना होता है, जिसे आना-पानाविधि कहते हैं। क्योंकि इसमें साधक (विद्यार्थी) जब अपनी आँखें बंद करके ध्यान की मुद्रा में बैठता है, वहाँ उसे महसूस करना होता है कि नाक के दोनों छिद्रों यानी नासिका से श्वास कब उसके अन्दर गयी और कब बाहर आई। नासिका छिद्र से श्वास दाएं या बाएँ से आई और गयी। तब हमारा मन उस श्वास पर कुछ क्षण ही टिकता है। फिर हमारा मन भूतकाल या भविष्य में खो जाता है। लेकिन आना-पानाकरते समय साधक को अपना मन केवल वर्तमान पर केन्द्रित करने की यह ‘प्रथम विधि’ है।

मन-मस्तिष्क पर नियंत्रण करना कोई आसान कार्य नहीं, क्योंकि मन चंचल एवं जंगली स्वभाव का है। दूसरी तरफ मन में बहुत सामर्थ्य होती है जिसे हम दृढ़-निश्चय कहते हैं। व्यक्ति अपने मन पर विजय प्राप्त करके इस जीवन और इस प्रकृति को समझ सकता है। श्वास कब हमारे शरीर में आई और कब बाहर गयी, श्वास बाहर निकलते समय नाक के किस सतह पर टकराई और अन्दर जाते वक्त नाक की कौन-सी सतह को छूती हुई अन्दर गयी आदि। इस प्रथम विधि में ही हम देखें, तो बहुत से लोगों का ध्यान अपने श्वास पर केन्द्रित नहीं हो पाता है। इस विधि में साधक को अपना ध्यान केन्द्रित करने के लिए किसी भगवान, किसी ईश्वर, किसी चित्र, किसी आकृति आदि पर ध्यान नहीं लगाना होता है। उदाहरणार्थ अगर इस विपश्यना की आना-पाना विधिमें ही कोई व्यक्ति एक-दो कहकर ही अपना ध्यान केन्द्रित करने लगे, कि उसके अन्दर श्वास कब आई और कब बाहर गयी, तब उसे यह कार्य बिलकुल आसान लगेगा, किन्तु इस विपश्यना विधि में ऐसा करना पूर्णतः वर्जित होता है। इस विधि में साधक को अपना पूरा ध्यान अपने श्वास के आवागमन पर ही केन्द्रित करना होता है।

इस प्रथम विधिमें ही आगे बढ़ने पर साधक को अपना ध्यान पूरे नाक पर केन्द्रित करना होता है। इसके बाद के क्रम में नाक के सिर्फ आगे वाले तिकोने कोण पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए नाक के आधार और ऊपरी ओंठ के ऊपर जिसे ओष्ठ (फिल्ट्रम) और मुस्टैश (मूछों) वाले हिस्से तक केन्द्रित किया जाता है। जिसके बाद साधक को वहाँ की संवेदना को अनुभव करना होता है, इसके बाद साधक उस संवेदना को समझने लगता है। साधक अपने ध्यान की एकाग्रता के लिए साढ़े तीन दिन तक आना-पानाविधि का अभ्यास करता है। शिविर के चतुर्थ दिन गुरुजी विपश्यना की विधि का सुत्तसाधकों को देते हैं। जिसकी प्रक्रिया दो घंटे चलती है, इसके बीच साधकों को वहां से उठना नहीं होता है। पाली भाषा में सूत्तयानी धागा, किसी किताब या किसी फाइल को चिन्हित करने के लिए इस शब्द का प्रयोग हुआ जो आज टैग के रूप में देख सकते हैं। उसी तरह बुद्ध सुत्त या अन्य विद्वानों की बात को पहले उद्धृत करने के लिए सूत्तशब्द कहा जाता था। जिसे बाद में संस्कृत भाषा में इसको सूत्रकहा जाने लगा। पाली भाषा में शिष्य गुरु से कहते हैं-गुरु जी आप हमें विपश्यना की विद्या दीजिये, इसपर गुरु पाली भाषा में ही कहते हैं कि तुम्हें विपश्यना की विद्या देता हूँ। जिसमें साधक को अपना पूरा ध्यान नाक के तिकोने हिस्से और ओष्ठ से सीधे माथे से ऊपर फोंटानेल (तालु) से जोड़ना होता है। जिसके बाद अपना पूरा ध्यान उपसर केन्द्रित रहते हुए सिर से लेकर पैर तक साधक को अपने शरीर के एक-एक अंग का निरीक्षण करना होता है। शरीर के जिस हिस्से में संवेदना समझ नहीं आ रही है। तब वहाँ दो-मिनट रूक कर उस संवेदना को समझने का निर्देश मिलता है। संवेदना उसके शरीर में धारा-प्रवाह हो रही है या नहीं। साधक अपने शरीर के किसी भी हिस्से की संवेदना को महसूस कर सकता है। बहुत से साधक अपने अंतर्मन की गहराइयों तक पहुँच जाते हैं, जब मैंने विपश्यना की तो शरीर में एक झनझनाहट और ऐसा लगा कि शरीर का एक्सरे हो रहा है। शरीर में कहीं सुखद और कहीं दुःखद अनुभव होने पर भी साधक को समता के भाव में रहना होता है। इस विधि को करते हुए साधक को अनुष्ठान का पालन करना होता है, जिसमें ध्यान की मुद्रा में बैठे होने, पैरों में दर्द आदि होने पर भी उसे सहन करना होता है।

इस पूरे विपश्यना में मैंने अनिच्चाशब्द सुना इसका अर्थ अनित्यहै जो कि सदा एक-सा हमारे जीवन में नहीं रहता है। साढ़े तीन हाथ ही काया में जो छल-कपट चलता रहा है और जो संवेदना होती है जिसका बदलते रहना उसका एक स्वभाव है। जीवन में जो भी है उसका अंत एक दिन होना निश्चित और स्वाभाविक प्रक्रिया है। विपश्यना में आचार्य सत्यनारायण गोयनका ने बुद्धम् शरणम् गच्छामि! धम्मम् शरणम् गच्छामि! संघम् शरणम् गच्छामि! को स्पष्ट किया है, यहां सिद्धार्थ गौतम की शरण में जाने का भाव नहीं है। बुद्ध का अर्थ ‘ज्ञान’ है बुद्धम् शरणम् गच्छामी का अर्थ ज्ञान की शरणमें जाना होता है। धम्म का अर्थ इस प्रकृति को समझनाहोता है। प्रकृति किसी के साथ भी भेदभाव नहीं करती है, चाहे कोई चोर हो, बेईमान हो, ईमानदार हो, आस्तिक हो या नास्तिक आदि। इन सभी को सूर्य की रोशनी, पानी, ऑक्सीजन आदि भी समान रूप से प्राप्त होता है, लेकिन उनके कर्मानुसार प्रकृति उन्हें दण्ड जरूर देती है, जिस दिन से कोई भी व्यक्ति गलत कार्य करने लगता है, उसी दिन से उसे दण्ड मिलना शुरू हो जाता है, क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। प्रकृति अपने कार्य और अपने सिद्धान्त कोई भी फेरबदल नहीं करती है। उसका सिद्धान्त हमेशा एक सा और समान रहता है। और संघ वो है जो पंचशील का पालनकरता है जैसे हिंसा न करना’, ‘चोरी न करना’, ‘झूठ न बोलना’, ‘नशा न करना’, ‘व्यभिचार न करना। जिससे प्रज्ञा का बोध होता है, प्रज्ञा का अर्थ है अपना प्रत्यक्ष ज्ञान। इसके उलटा परोक्ष ज्ञान जिसे हमने अपनी कसौटी पर नहीं उतरा है। विपश्यना के आखिरी दिन गुरु जी मैत्री विधि देते हैं-जिसमें अपने घर आस पड़ोस में लोगों के लिए, ‘तेरा मंगल मेरा मंगल हम सबका मंगल होए रे...को साधक जीवन में धारण करें। गुरु जी, अपने प्रवचन और प्रार्थना के बाद भवतु सब्ब मंगलम्कहते हैं इसका अर्थ सभी जीवों का कल्याण हो, जिसे सुनकर पुराने साधक और बाद में नए साधक साधु...साधु...कहते हैं, इसका अर्थ होता है ऐसा ही हो...ऐसा ही हो...। यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म में लोगों की मंगलकमानाएं करने के लिए उनके अनुयायी आमीन...अमीन...आमीन कहते हैं, इसका अर्थ है-ईश्वर ऐसा ही करे...ऐसा ही करे...। समझना आवश्यक है कि साधु...साधु और आमीन...आमीन कहाँ कहना है। बुद्ध ने कहा है अप्पा दीपो भवइसके लिए हमें अपना विवेक जागृत करना होता है। यह नहीं कि किसी की हत्या करनी है और हम साधु...साधु या आमीन...आमीन कहें। कुछ करने, कुछ बोलने से पहले किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, जाति आदि के व्यक्ति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। उसके सामने वाला व्यक्ति क्या तर्कपूर्ण और न्यायपूर्ण बात कह रहा है? यह चिन्तन ही व्यक्ति में मानवीय चेतना को उत्पन्न और विस्तृत करता है।

विपश्यना के आना-पानाविधि से, साधक अपने मन के नैसर्गिक (स्वाभाविक) श्वास से आरम्भ करके, अपने शरीर में होने वाले परिवर्तन का निरीक्षण करता है। मन अपने अंतर्मन की गहराईयों तक पहुंचकर अपने पूरे शरीर का निरीक्षण करता है। और दुःखद या सुखद होने पर समता बनाये रखने पर जोर देता है। दुःख है, तो वह एक निश्चित अवधि तक समाप्त हो जायेगा और सुख है तो वो भी निश्चित अवधि तक है। मानव जीवन में दुःख होने पर व्यक्ति को व्याकुल नहीं होना चाहिए और सुख होने पर राग (घमंड) नहीं जगाना चाहिए। विपश्यना हमें ज्ञान(प्रज्ञा), शील (नैतिक आचरण) और समाधि (एकाग्रता) की ओर ले जाता है। विपश्यना को पाली भाषा में ‘विपस्सना’ कहते हैं, इसमें स्वयं को विशेष अनुभव करते हुए अपने भीतर के चित्त यानी मन को जानना होता है। इस विपश्यना विधि को करने में मानसिक रूप से कुछ दिव्यांग, शराब, बुरी लत, माइग्रेन, मानसिक रोग एवं अन्य बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति लाभ ले रहे हैं। विपश्यना को अपने जीवन में धारण करना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि यह मानवीय धर्म की बात पर जोर देता है। अगर कोई विपश्यना की पहली विधि आना-पानाको ही धारण कर ले तो वो अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। क्योंकि गुस्सा आने पर उसका श्वास तीव्र हो जाएगा, जिसे वो अनुभव कर सकता है।

एक बात और, वहां आये साधक एवं कुछ लोग मुझे बड़े ही आश्चर्य से देख रहे थे, कारण स्पष्ट था, उनमें से एक-दो ने तो पूछ भी लिया, ‘भाई साहब इस्लाम धर्मको मानने वाले तो यहां आते नहीं हैं।मैं उसकी बात को सुन ही रहा था, तभी उसने कहा, ‘वो तो अपने धर्म के प्रति बहुत कट्टर होते हैं।मुसलमानों के प्रति समाज में नकारात्मकता का प्रसार हुआ है, प्रथम तो यह है कि उनकी देशभक्ति पर संदेह करना एक आम बात बन गयी है। खैर समझना आवश्यक है कि सभी धर्मों के लोगों की सोच समान होती है। जैसे हिन्दू हैं उसी तरह मुसलमान हैं या अन्य सम्प्रदायों के लोग हैं। गुरु जी सत्यनारायण गोयनका ने विपश्यना विद्या को धर्म से अलग करके स्पष्ट किया है। कोई व्यक्ति या कोई विपश्यी यानी विपश्यना करने वाला अपने धर्म सम्प्रदाय का अनुसरण करते हुए तथागत बन जाता है, तथागत का अर्थ तर्कशील होता है वो अपने आराध्य देव को मानता है लेकिन वो इसलिए नहीं मानने लगेगा कि उसे उनसे लाभ मिले। विभिन्न सम्पदायों में द्वेष का आधार भौतिक है। विपश्यना से व्यक्ति धर्म के उस वास्तविक अर्थ को समझने लगता है किसी भी धर्म के देवता लोगों का कल्याण करना चाहते हैं न की अकल्याण।

व्यक्ति में धर्म के प्रति उसका वास्तविक विवेक जागृत होता है कि धर्म तो वैश्विक होता है, धर्म की कोई सीमा रेखा नहीं होती है। हम देखते हैं कि साम्प्रदायिकता का मूल कारण धर्म को सीमित और स्थान विशेष के आधार पर देखना भी है। धर्म तो एक हवा की तरह है, वो है इंसानियत का भला करना। और विपश्यना एक हवा है जिसे कोई भी धारण कर सकता है। दूसरी बात, विपश्यना का स्थान कोई मनोरंजन, बातचीत, व्यापार का स्थान नहीं होता है। लेकिन बहुत से ऐसे पथ भ्रष्ट लोग आकर यहाँ जीवन को समझने लगते हैं। विपश्यना एक कठिन साधना है, जोकि आज सभी के लिए उपलब्ध है। इससे व्यक्ति का मानसिक विकास, वाक् पर नियंत्रण, कर्म-प्रधान पर बल, और मानवीय चेतना में विकास हो रहा है।  

  

6 जनवरी, 2024 को नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

Friday, 1 June 2018

समाज और मानवीय हक़ को मज़बूत करते रिश्ते





किसी सेमिनार में मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई। बातचीत में ही उसने बताया-वह अपने मित्र के साथ पिछले चार वर्षों से रह रही है, जोकि किसी मीडिया संस्थान में कार्यरत हैं।  उन दोनों के सन्दर्भ में एक शोधार्थी की प्रतिक्रिया यह थी-‘यह लड़का उस लड़की को यूज एण्ड थ्रो ही करेगा।’ उससे मैंने कहा-‘मुझे इस सम्बन्ध से क्या देना-देना, जो लड़की शोध कर रही है, उसे अपने अच्छे और बुरे का पता है।’ ऐसी बातें जो लोग करते हैं, सही मायने में उनके मस्तिष्क में पितृसत्ता का कचरा भरा हुआ होता हैं। खैर एक रोज मैं विश्वविद्यालय गया हुआ था, उस लड़के से मेरी दूसरी मुलाकात हुयी, एक बार उसने मुझे ऑटो में लिफ्ट दिया था, जब उससे मेरी पहली मुलाकात।

उससे बातचीत में बताया कि वह भी शोधकार्य कर रहा है, पिछले वर्ष ही उसका एडमिशन इस विश्वविद्यालय में हुआ। अब उसने अपनी नौकरी को छोड़ कर पूर्णत: शोध कार्य में संग्लन है, लेकिन फ्रीलांसिंग कर रहा है, मेरी उससे विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुए थी, जैसे जातिवादी मानसिकता,  पढ़ाई-लिखाई, मीडिया, सेमिनार, वर्तमान फेलोशीप, विभागीय सेमिनार, विभाग और शिक्षक का आदि ।


बात ही बात में, मैंने उससे पूछ लिया-आपके साथ रह रही लड़की को आप कब से जानते हैं, क्या आपका प्यार यूज एण्ड थ्रोतो नहीं है। तब उसने कहा-ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं उससे विवाह करूंगा। बस थोड़ा जीवन में स्थायित्व आ जाये। उसने मुझे यह भी बताया-कि वह एक दूसरे को करीब 8 वर्षों से जानते हैं, मैंने कहा-आप किराये पर रहते हैं, तब क्या मकान मालिक आप दोनों के साथ रहने पर कुछ नहीं कहता? तब उसने कहा-नहीं जान पहचान वालों के साथ में हूं, लेकिन ऐसी कोई स्थिति अभी तक सामने नहीं आई है, सभी को हमारे रिश्ते के बारे में पता है। 

फिर मैंने उससे पूछा-क्या आपके परिवार वालों को इस लड़की के साथ विवाह करने पर कोई आपत्ति तो नहीं? उसने कहा -शुरू में घरवाले पक्ष में न थे, लेकिन बाद में हो गये। घर वालों को पता चल गया कि यह लड़का नहीं मानेगा । मैंने उससे पूछा-क्या लड़की के परिवार को आपके बारे में पता है? तब उसने कहा हाँ कुछ हद तक पता है पूछने पर उसने कहा-वह अनुसूचित जाति से है? मुस्लिम और कुछ हिन्दू  के सन्दर्भ में उसने पिछले चार वर्षों में हुए कुछ सामाजिक बदलाव के बारे में कहा-गांव में जहां, पहले हिन्दू जाति और मुस्लिम जाति बच्चे एक साथ क्रिकेट खेला करते थे। अब कुछ दूरियां बढ़ती दिख रही हैं, उसी कड़ी में मेरे घरवालों ने लड़की का विरोध किया था, लेकिन अब सब सामान्य है।

मैंने उससे पूछा-उस लड़की में ऐसी क्या बात दिखती है कि आपको उससे प्यार हो गया। तब उसने कहा-वह बहुत मासूम, बेहद बचपना, स्वच्छंद विचारों की है। मैंने पूछा- उसमें आपको और क्या लगता है? तब उसने कहा-वह बेहद शान्त स्वभाव की है। उसमें कोई बनावटी पन नहीं है। उसने आगे  बताया-उसे लगता है कि वह इसके साथ अपना सम्पूर्ण जीवन निभा सकता है। मैंने पूछा- आप लोगों के बीच कोई मन-मुटाव हुआ है? उसने कहा-शुरू में हुआ, जब हम एक दूसरे को समझ रहे थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता, हम बात को समझ जाते हैं। मैंने पूछा-जब आपको यह लगेगा कि मुझे इसके साथ नहीं रहना है, तब क्या आप उसके साथ नहीं रहेगे, तब आपका प्यार ख़त्म हो जायेगा? तब उसने कहा ऐसा नहीं है? मैं पूरी तरह से उसके प्रति समर्पित हूं।,




वगैर वैवाहिक बन्धन के लड़के-लड़कियां एक साथ रहकर अपने जीवन साथी का चुनाव करना, यह भारतीय समाज के वृहत होते लोकतंत्र का परिचायक है। दूसरी तरफ माता-पिता एवं परिवार द्वारा सदियों से बच्चों की राय के बिना उनके लिए जीवन साथी चुनने की प्रक्रिया में संग्लन हैं । कुछ समाज व वर्गों में स्वतंत्र विवाह की परम्परा भी देखी है, लेकिन व्यापक स्तर पर बच्चों की मंशा को दरकिनार ही क्या जाता है। भारतीय समाज में यह देखा जाता है कि शादी में माता-पिता, परिवार की इच्छा प्रथम है। ज्यादातर अभिभावक लड़कियों के सन्दर्भ में उनकी राय तक नहीं लेते हैं, लेकिन कुछ शिक्षित परिवारों में काफी हद तक बदलाव भी आया है। वह अपने बच्चों से राय विमर्श करके उनकी इच्छाओं के अनुरूप फैसले ले भी रहे हैं। सर्वमान्य यह होना चाहिए कि अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों के मानवाधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाता है कि बहुतेरे बच्चे अपने अभिभावकों की इच्छानुसार ही अपने जीवन साथ का चुनाव करते हैं। पता नहीं, इसे हमारे समाज में बेहतर क्यों माना जाता है? जो लड़के-लड़कियां अपनी पसन्दानुसार जीवन साथी का चुनाव करते हैं, अगर अभिभावक मान जाते हैं, अगर भविष्य में उन बच्चों का विवाहिक जीवन असफल या उसमें खींचतान होती है, तब अभिभावक अपने हाथ खड़े भी करते हैं,



दूसरी तरफ बच्चों को इतना सक्षम होना बेहद जरुरी है, ताकि वह अपनी परेशानी का मुकाबल स्वयं करें, जब प्रेमी पति और प्रेमिका पत्नी बन जाने पर भी दोनों में प्रेमी और प्रेमिका का ही सम्बन्ध रहना चाहिए. लेकिन जब वहां पति और पत्नी के समबन्ध में परम्परावादी हावी हो जाता है, चाहे वह माता-पिता हो या अन्य कोई  उन्हें अपने प्रेमी और प्रेमिका वाले रिश्ते को ही अहमियत देना चाहिए, या दोनों में इतनी सूझ बूझ विकसित होनी चाहिए, जहाँ इसकी कमी आती है, वहां रिश्ता टूट जाता है. उस रिश्ते में यदि जाति, धर्म विशेष की बात कर किसी को अपमानित करने के लिए किया जाता है, तब उन दोनों को उनका डटकर जवाब भी देना चाहिए। विमर्शात्मक तथ्य यह भी है कि अभिभावकों का चयन ज्यादातर गलत ही होता, कोई कहता है कि अरेंज मेरिज सफल है, इसके पीछे का मुख्य कारण महिला परम्परावादी को स्वीकार करना ज्यादा होता है, पितृसत्ता को स्वीकार होती है । रिश्ते के सफल होने में इच्छा का अहम योगदान होता है।  

तीसरी तरफ रूढ़ीवादी, परम्परावादी व संकुचित मानसिकता के लोग सक्रिय हैं। कभी ऐसे रिश्तों को लव-जिहाद, विदेशी संस्कृति का दोष, ऑनर किलिंग के नाम पर हत्याएं कर रहे हैं। मैं इन दोनों को एक परिवर्तनवादी के तौर पर देखता हूं। अब देखना यह है कि इनका प्यार कहां तक सफल होता है, लेकिन इसका अधिकार मेरे पास या किसी के पास नहीं होना चाहिए, यह उनका व्यक्तिगत मसला है, कोई कुछ कर सकता हैं तो इनके इनके प्यार के लिए मंगलकामनाएं। मैंने उस लड़के में यह पाया कि उसमें मेल इगो नहीं है, समाज ऐसे रिश्तों को कुछ भी कहे, उसपर ध्यान देने की कुछ जरुरत होनी चाहिए, ऐसे रिश्तों स्वभाविक रूप से हमारे समाज और मानवीय हक़ को मज़बूत कर रहे हैं। 



(नोट : यह जिस लड़के पर आधारित है, उनसे मेरी यह सामान्य बातचीत, कोई साक्षात्कार नहीं है। उससे विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुयी, लेकिन मैंने सिर्फ एक पहलू पर लिखा है, यह भी हो सकता है, मेरे नज़रिये में कुछ लगती हो तो मैं उसे सुधार करूँगा)। 

सैयद परवेज़, विश्वविद्यालय संस्मरण, वर्ष 201621 मई, 2018, नई दिल्ली

Monday, 23 April 2018

दानवीर की श्रेणी में ऋणात्मक रूप से नीचे



~सैयद परवेज़

20 अप्रैल, 2018 को मैं अपने मित्र रूबेन मिंज के साथ, जवाहर लाल नेहरू मैट्रो स्टेशन पर था, वहां पर मैं बदरपुर और वह कश्मीरी गेट मेट्रो की प्रतीक्षा में थे. तभी लगभग एक 35 वर्षीय लड़की हमारे पास आकर बोली, किसी ने मेरा पर्स मार लिया है। क्या आप मेरी मदद 100 रुपये देकर कर सकते हैं? मेरे पूछने से पहले ही उसने कहा-एक व्यक्ति ने नज़फगढ़ तक मैट्रो किराया देकर उसकी सहायता कर दी है, लेकिन उससे आगे जाने के लिए भी उसे कम से कम उसे 100 रुपये की और जरूरत थी।
मेरे पास उस वक्त सिर्फ 100 रुपये ही थे। मैंने रुबेन से कहा क्या तुम्हारे पास कुछ पैसे बच्चे हैं, रुबेन ने भी असमर्थता व्यक्त की। हमारी असमर्थता का का मुख्यकारण था कि कुछ देर पहले ही रुबेन ने बब्लू शूज शोरुम, लोधी रोड से अपने चचेरे भाई के लिए जूता खरीदा लिया था, रुबेन को जो जूता पसन्द आया, अनुमान के अनुसार उसकी कीमत कुछ ज्यादा थी, जूता ले तो लिया था, लेकिन पैसे कम बचे थे। उसने मैट्रो स्टेश न पर ही 100 रुपये का रिचार्ज करवाया था, उसके पास कुल 20 रुपये बचे थे। मैं तो उसके साथ घूमने साथ ही गया था, लेकिन मुझे भी वहां बाबा यानी पापा के लिए एक सैंडल पसन्द आ गया था, तब मैंने भी उसे खरीद लिया। मेरे पास भी अब केवल 100 रुपये बच्चे थे, मैट्रो कार्ड पहले से ही रिचार्ज था। अगर मेरे पास खुले 50-50 रुपये भी होते तो मैं उस लड़की सहायता जरूर करता। लेकिन मैं न कर सका, मुझे इसका बेहद दुःख है और पक्षतावा भी, तभी बदरपुर की मेट्रो आ गयी. एक बार आया की जंगपुरा, वापस जाकर उसकी सहायता करूँ. 
वर्ष 2015 में, जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएच.डी का फॉर्म लेने गया था, विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर ही एक मोटा ताजा व्यक्ति मिला, जिसने मुझसे कहा था कि मुझे गुड़गांव जाना है, किसी ने मेरी पॉकेट मार लिया है, तब मैंने उसे मैट्रो का किराया और निर्धारित मैट्रो स्टेशन से उसके घर तक का किराया दिया था। उसने कहा था कि मैं आपके मोबाईल का रिचार्ज कर दूंगा, मुझे पता था कि यह नहीं करायेगा, लेकिन मैंने उसे अपना मोबाईल नम्बर उसकी ईमानदारी चैक करने के लिए दिया था। खैर 20 अप्रैल, 2018 घटना से लगभग 10 दिन पहले मुझे बदरपुर बॉर्डर पर एक व्यक्ति, उसके साथ में एक महिला और एक छोटी बच्ची दिखी, मैं उनके बगल से गुज़ारा था, तभी वह आदमी मेरे पास आया और कहा कि मैं महाराष्ट्र से हूं यहां मजदूरी करता हूं ठेकेदार हमारी मजदूरी लेकर भाग गया। तब मेरे पास पैसे नहीं थे, मैंने उसे 10 रुपये दिये। जब मैंने उसे पैसे दिए तब मुझे लगा की मैं इसे पहले भी मदद कर चुका हूँ. ऐसा ही व्यक्ति मुझे यहीं पर पहले भी मिला था.   


मेरी दूर के फूफा और फूफीजी कानपुर के कपड़ा खरीद कर आ रहे थे, उन्होंने छोटे से टेलर की दुकान से कपड़े की दुकान नयी नयी खोली थी, कानपुर स्टेशन पर ही किसी ने उनका पर्स मार लिया था। कानुपर से उन्हें सिंगरोली, मध्य प्रदेश आना था। उन्होंने कपड़ा तो कानपुर से गाड़ी में बुक करा दिया था। लेकिन पति-पत्नी स्टेशन पर फंस गये। उनके पास इतना पैसा भी न था कि वे दोनों घर पहुंच सके। पति-पत्नी काफी परेशान होकर स्टेशन पर ही बैठे थे। तभी एक रेलवे पुलिस का जवान उनके पास आया। और उनकी परेशानी का कारण पूछा, फूफाजी ने उसे अपनी परेशानी का कारण बताया। जवान ने तुरन्त 500 रुपये फूफा को दिये। फूफा ने उस जवान का नम्बर लिया और कहा क्या आपको हम पर विश्वास हो गया। जवान ने कहा-भाई साहब इतने दिन नौकरी करते हो गये हैं रेलवे में । इतना अंदाजा तो हो ही गया है कि कौन झूठ और कौन सच बोल रहा है,  फूफा ने जवान का नम्बर ले लिया लिया, घर पहुंचने पर उसके खाते में 500 रुपये जमा करा दिये। 

जामिया मिल्लिया के मुख्य रोड जो होली फेमिली से निकलती हुई बाटला हाउस और आगे निकल जाती है। जामिया के दोनों हिस्सों यानी बीच में से वह सड़क निकलती है, छात्रों को एक तरफ से दूसरी तरफ जाने में डर जरूर लगता होगा, भाई मुझे तो लगता था, पत्र भी लिखकर मैं एक बार जामिया प्रशासन के पास गया था, प्रो. दुर्गा सर को भी दिखाया था, उन्होंने कहा था कुछ गलतियाँ हैं, हमने कुछ वर्ष पहले सब बे बनाने की बात कही थी, तुम अपनी पढाई करो, इस चक्कर मैं न पड़ो, लेकिन मैं पत्र को जामिया प्रशासन ने स्वीकार नहीं किया, मैं भी ज्यादा चक्कर मैं नहीं पड़ा. मेरा सुझाव था कि सड़क पत्थर की वाहन रोधक होनी चाहिए ताकि, वाहन की स्पीड को कम किया जा सके। उसी सड़क पर एक महिला, अक्सर घर से भुल जाना या पैसे खत्म हो गये के नाम पर पैसे मांगती है। मैं उसे पहचानता हूं, वह मुझे कई बार मिल चुकी है, परन्तु जब भी वह मुझे मिलती है, तब मैं उसे कुछ रुपये जरूर दे देता हूं। 100 मांगने पर 10 तो देता ही हूं। 
लेकिन 20 अप्रैल, 2018 की घटना जब मैं उस महिला की मदद न सका। तो मुझे बड़ा दुःख हुआ। एक निष्कर्ष तो यह है कि मैं दानवीर की श्रेणी में ऋणात्मक रूप से नीचे हूं। इसके लिए मुझे ऐसे मौके पर पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे अपना ही घाटा क्यों न हो? चाहे आपको पैदल ही क्यों न आना पड़े। चाहे आपको उस दिन भूखा ही क्यों न रहना पड़े। हमें लोगों की सहायता करने में पीछे नहीं रहना चाहिए। 


Thursday, 12 April 2018

केक मर्यादा में लगाये





मैं एक बच्चे के बर्थडे (जन्मदिन) प्रोग्राम में गया हुआ था। बर्थडे कार्यक्रम लगभग शाम के सात बजे शुरू हुआ। सर्वप्रथम केक कटा। इसके बाद जैसाकि आजकल के जन्मोत्सव आयोजनों के देखने को मिलता है। विशेषतौर पर युवा अपनी खुशी या मजाक को जाहिर करते हुए अपने दोस्तों के चेहरे पर केक लगाते हैं। इसे खुशी का एक स्वाभाविक रूप से माना भी जा सकता है। खैर केक कटने के बाद, वहां पर भी मुंह पर केक चपोरने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ करीबी मित्र एवं रिश्तेदार आपस में केक लगा रहे थे, कुछ दूरी बनाकर भी खड़े थे। हाकिम सिंह नामक शख्स ने अपनी करीबी (जुल्म सिंह) की पत्नी जोकि हाकिम सिंह की करीबी रिश्ते में भाभी लगती थी, उसके चेहरे पर केक लगा दिया। हाकिम सिंह ने सर्वेश्वर सिंह की पत्नी के चेहरे पर भी केक लगाया था दोनों महिलाएं ही हाकिम सिंह की भाभी लगती थीं। इसी तरह अन्य मित्र भी चेहरे पर केक की लिपा-पोती कर रहे थे। बर्थडे वाले बच्चे के पिता समशेर सिंह पर उनके मित्र संतोष पाल सिंह ने तो पूरे चेहरे पर केक मल दिया था। केक की लिपा-पोती के बाद, खाना भी शुरू हो गया। बीच में पता चला कि जुल्म सिंह और उनकी पत्नी व बच्चे प्रोग्राम से चले गये हैं। कुछ रिश्तेदार जुल्म सिंह की खोज बीन में भी लग गये थे। दूसरी तरफ डीजे का शोर था जिसपर बच्चे व युवा नाच रहे थे। उनमें कुछ लोग खाने और पीने में मस्त थे। उसी दौरान दो पुलिस कांस्टेबल के साथ जुल्म सिंह प्रोग्राम में वापस आया।
बर्थडे के आयोजक समशेर सिंह जोकि जुल्म सिंह का चचेरा भाई ही था। केक लगाने वाला हाकिम सिंह समशेर सिंह का सगा जीजा था। जब यह बात हाकिम सिंह को पता चली, तो उन्होंने सरेआम जुल्म सिंह से मांफी मांग ली और कहा-भाई साहब मैंने तो मजाक में ही भाभी को केक लगा दिया था। घर की बात है, पुलिस में कम्प्लेन न करें।
हाकिम सिंह ने आगे कहा-भाई साहब मैं गरीब ही सही, कुछ तो रिश्ते हैं ही आपके मुझसे। हाकिम सिंह की पत्नी भी रोते हुए जुल्म सिंह से मांफी मांगी। लेकिन जुल्म सिंह न तो चचेरी बहन का रोना समझ पा रहा था न ही जीजा की माफी मांगना। वह तो बस अपनी बात पर अडा हुआ, हाकिम सिंह को सजा दिलवाने पर ही तुला था।
जुल्म सिंह की पत्नी ने भी पुलिस शिकायत न करने को कहा था, परन्तु जुल्म सिंह उसे भी धमकाते हुए कह दिया-तुझे मेरे साथ रहना है की नहीं।यह सुनकर वह डर गयी थी। सबसे पहले जुल्म सिंह ने अपनी पत्नी से ही कॉल 100 पर फोन करके पुलिस को बुलवाया था। आए पुलिस कांस्टेबल यह सब माजरा देख और समझकर बड़ी हैरान व परेशान भी थे। एक पुलिस कांस्टेबल ने जुल्म सिंह को समझाते हुए कहा-देखो भाई इतनी बड़ी बात तो है नही।जुल्म सिंह ने तो पुलिस वाले से कह दिया-मैंने आपको बुलाया है, इसने मेरी पत्नी के साथ छेड़-छाड़ की है, मैं इसे  नहीं जानता और न ही मेरे ये रिश्तेदार हैं।
मैंने भी उन पुलिस कांस्टेबल से बात की। इसपर एक पुलिस वाले ने कहा-भाई औरत की कम्प्लेन है अगर औरत इस कम्प्लेन को वापस लेती है तो कोई केस नहीं बनेगा। एक पुलिस कांस्टेबल ने मुझसे यह भी कहा कि ऐसी घटना और ऐसा आदमी मैंने पहली बार देखा है, जिसे रिश्तों की समझ ही नहीं है। भाई गलती हो गयी बन्दा माफी मांग रहा है। जुल्म सिंह को समझाने-बुझाने में लगभग रात के 11 बज गये थे। पुलिस व रिश्तेदारों के समझाने पर भी जुल्म सिंह न माना। तब पुलिस हाकिम सिंह को अपने साथ पुलिस थाने में ले गई।
मैं भी उन लोगों के साथ पुलिस थाने में गया। तब रात के 1 बज गये थे। एक पुलिस कांस्टेबल ने कहा-आप लोग जुल्म सिंह से एक बार और बात कर लीजिए। मान जाए तो ठीक है।
इसके बाद मैं और कुछ अन्य लोग जुल्म सिंह के घर गये। लेकिन उसने दरवाजा ही न खोला, बहुत देर के बाद चौथी मंजिल से ही बोला-सुबह बात होगी।
इसके बाद अन्य लोगों के साथ मैं भी पुलिस थाने में आ गया। और यह माजरा पुलिस कांस्टेबल को बताया। तब पुलिस कांस्टेबल ने कहा-अब तो मामला दर्ज करना ही पड़ेगा। महिला का मामला है, अधिकारी लोग हमसे पूछेगें, भाई ग्राउण्ड में हम रहते हैं, हम जानते हैं इतनी बड़ी बात नहीं है, लेकिन  उस महिला ने पुलिस अधिकारी से पूछा तो, हमें अधिकारी को जबाब देना होगा।  
एक सब इंस्पेक्टर ने तो महिला सुरक्षा की नया कानूनी पुस्तक भी दिखाते हुए कहा-भाई निर्भया केस के बाद महिला सुरक्षा सम्बन्धी कानून बड़े सख्त हुए हैं।इसके बाद थाने में हाकिम सिंह के खिलाफ महिला छेड़छाड़ की कुछ मामूली धाराओं के साथ एफ.आई.आर. दर्ज हो गयी।
कांस्टेबल कीर्तन लाल कुछ धाराओं व फॉर्म की जानकारी के लिए एक सब इंस्पेक्टर के पास गए । सब इंस्पेक्टर ने हाकिम सिंह से गाँव, उम्र पूछा मेडिकल व अन्य फार्म भरकर कीर्तन लाल को बताया। और कहा ऐसे आगे के फार्म भरो। जब कीर्तन लाल फार्म भरने लगे तो एक शब्द लिखकर रूक जाते और मात्रा आदि पूछने लग जाते।
यह सब देखकर सब  इंस्पेक्टर भूरे सिंह ने गुस्से में कांस्टेबल कीर्तन लाल से कहा-अरे तुझे कांस्टेबल किसने बना दिया।फिर टेबल पर रखे गिलास पर नज़र दौड़ाई और अपने दराज़ से दवा की एक गोली निकाली कर खाई।  
वहां मौजूद समशेर सिंह के करीबी अंक्ल ब्रिजभान प्रसाद सिंह ने इंस्पेक्टर भूरे सिंह से कहा-देख लो साहब जमानता यहां हो जाए तो ठीक रहेगा।
इसपर भूरे सिंह ने उनसे कहा-भाई साहब कीर्तन लाल ही कुछ करेगा।भूरे सिंह ने आगे कहा-भाई समझदार हैं,  हम ही बोलते रहेंगे, आप भी तो बोलो।
ब्रिजभान सिंह बोले-साहब दो हजार से काम हो जायेगा।
इंस्पेक्टर भूरे सिंह बोले -भाई साहब कीर्तन लाल से बात करिये। 4:30 बज गये हैं, थोड़ा आराम कर लेता हूं सुबह मुझे कोर्ट भी जाना है।
बहुत देर तक कीर्तन लाल नहीं आये। तब एक कांस्टेबल से ब्रिजभान सिंह ने बात की। वह दस हजार लेकर जमानत देने पर राजी हुआ। ब्रिजभान सिंह बोले नहीं साहब पांच हजार लीजिए और छोड़िए। घर पर सब लोग परेशान हैं, हमने तो खाना भी नहीं खाया.  
कांस्टेबल कीर्तन लाल के पास ब्रिजभान सिंह गये और हाथ में पांच हजार देते हुए बोले लीजिए साहब इतना ही है।
इसी दौरान वहां एक और कांस्टेबल आ गया । कीर्तन लाल उसको देखते हुए बोले, आप लोग ऐसे ही ले जाओ। जब मैं फ़ोन करू तो हाज़िर होना है, कुछ देर के बाद आया हुआ कांस्टेबल वहां से चला गया, तब कीर्तन लाल ने कहा-भाई एस.एच.ओ. काली चरण को भी हिस्सा देना होता है।
ब्रिजभान सिंह ने अपना रक्षा मंत्रालय का आईकार्ड भी दिखाया। इस पर कीर्तन लाल ने उन्हें मना किया। ऐसे न दिखाया करो, सरकारी नौकरी में हो, कीर्तन लाल ने ब्रिजभान सिंह का आधार कार्ड लिया और बेल पेपर पर उनसे और हाकिम सिंह से हस्ताक्षर कराये।
मैंने देखा कि किस प्रकार लोग कानून का दुरुपयोग करते हैं। जरूरत है, ऐसे लोगों से बहुत दूरी बनाकर रहने की। मेरा अपना तर्क और मानना यह भी है कि जिस व्यक्ति में क्षमा करने की शक्ति नहीं, फिलिंग नहीं है, जिसमें दया नहीं है, जिसमें मानवता नहीं है, जिसे रिश्तों की कद्र नहीं है। वह इनसान होते हुए भी इनसान नहीं है। इसके साथ मेरा सुझाव यह भी है कि किसी भी व्यक्ति को केक लगाने से पहले सावधान रहे, मर्यादा में ही रहे। नहीं तो अंजाम बुरा भी हो सकता है।
इस घटना का एक दूसरा धनात्मक पक्ष यह भी है कि अगर गलती किसी से भी हुई है या की है चाहे वह अपना कितना भी करीबी सगा क्यों न हो। उसे सजा दिलवानी ही चाहिए। लेकिन वह गलती कैसी है, सजा इस पर विशेष निर्भर करता है। एक तरफ यह भी देखने को मिलता है कि बहुत-सी महिलाओं  के साथ पिता, चाचा, मामा आदि बलात् दुष्कर्म कर देते हैं, ऐसी घटनाएं घरों में होती हैं। जोकि लोग उसे घर की इज्जत के नाम पर चाहर दीवारी के अन्दर ही रखे रहते हैं, जबकि यह सरासर गलत और अमानवीय  है। गलती के खिलाफ आवाज़ को बुलन्द करना बेहद जरूरी है।
(यह सत्य घटना पर आधारित है, नाम और स्थान व पात्र में थोड़ा बदलाव है)
~सैयद परवेज     6 मार्च, 2018 को

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