Friday, 1 June 2018

समाज और मानवीय हक़ को मज़बूत करते रिश्ते





किसी सेमिनार में मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई। बातचीत में ही उसने बताया-वह अपने मित्र के साथ पिछले चार वर्षों से रह रही है, जोकि किसी मीडिया संस्थान में कार्यरत हैं।  उन दोनों के सन्दर्भ में एक शोधार्थी की प्रतिक्रिया यह थी-‘यह लड़का उस लड़की को यूज एण्ड थ्रो ही करेगा।’ उससे मैंने कहा-‘मुझे इस सम्बन्ध से क्या देना-देना, जो लड़की शोध कर रही है, उसे अपने अच्छे और बुरे का पता है।’ ऐसी बातें जो लोग करते हैं, सही मायने में उनके मस्तिष्क में पितृसत्ता का कचरा भरा हुआ होता हैं। खैर एक रोज मैं विश्वविद्यालय गया हुआ था, उस लड़के से मेरी दूसरी मुलाकात हुयी, एक बार उसने मुझे ऑटो में लिफ्ट दिया था, जब उससे मेरी पहली मुलाकात।

उससे बातचीत में बताया कि वह भी शोधकार्य कर रहा है, पिछले वर्ष ही उसका एडमिशन इस विश्वविद्यालय में हुआ। अब उसने अपनी नौकरी को छोड़ कर पूर्णत: शोध कार्य में संग्लन है, लेकिन फ्रीलांसिंग कर रहा है, मेरी उससे विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुए थी, जैसे जातिवादी मानसिकता,  पढ़ाई-लिखाई, मीडिया, सेमिनार, वर्तमान फेलोशीप, विभागीय सेमिनार, विभाग और शिक्षक का आदि ।


बात ही बात में, मैंने उससे पूछ लिया-आपके साथ रह रही लड़की को आप कब से जानते हैं, क्या आपका प्यार यूज एण्ड थ्रोतो नहीं है। तब उसने कहा-ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैं उससे विवाह करूंगा। बस थोड़ा जीवन में स्थायित्व आ जाये। उसने मुझे यह भी बताया-कि वह एक दूसरे को करीब 8 वर्षों से जानते हैं, मैंने कहा-आप किराये पर रहते हैं, तब क्या मकान मालिक आप दोनों के साथ रहने पर कुछ नहीं कहता? तब उसने कहा-नहीं जान पहचान वालों के साथ में हूं, लेकिन ऐसी कोई स्थिति अभी तक सामने नहीं आई है, सभी को हमारे रिश्ते के बारे में पता है। 

फिर मैंने उससे पूछा-क्या आपके परिवार वालों को इस लड़की के साथ विवाह करने पर कोई आपत्ति तो नहीं? उसने कहा -शुरू में घरवाले पक्ष में न थे, लेकिन बाद में हो गये। घर वालों को पता चल गया कि यह लड़का नहीं मानेगा । मैंने उससे पूछा-क्या लड़की के परिवार को आपके बारे में पता है? तब उसने कहा हाँ कुछ हद तक पता है पूछने पर उसने कहा-वह अनुसूचित जाति से है? मुस्लिम और कुछ हिन्दू  के सन्दर्भ में उसने पिछले चार वर्षों में हुए कुछ सामाजिक बदलाव के बारे में कहा-गांव में जहां, पहले हिन्दू जाति और मुस्लिम जाति बच्चे एक साथ क्रिकेट खेला करते थे। अब कुछ दूरियां बढ़ती दिख रही हैं, उसी कड़ी में मेरे घरवालों ने लड़की का विरोध किया था, लेकिन अब सब सामान्य है।

मैंने उससे पूछा-उस लड़की में ऐसी क्या बात दिखती है कि आपको उससे प्यार हो गया। तब उसने कहा-वह बहुत मासूम, बेहद बचपना, स्वच्छंद विचारों की है। मैंने पूछा- उसमें आपको और क्या लगता है? तब उसने कहा-वह बेहद शान्त स्वभाव की है। उसमें कोई बनावटी पन नहीं है। उसने आगे  बताया-उसे लगता है कि वह इसके साथ अपना सम्पूर्ण जीवन निभा सकता है। मैंने पूछा- आप लोगों के बीच कोई मन-मुटाव हुआ है? उसने कहा-शुरू में हुआ, जब हम एक दूसरे को समझ रहे थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होता, हम बात को समझ जाते हैं। मैंने पूछा-जब आपको यह लगेगा कि मुझे इसके साथ नहीं रहना है, तब क्या आप उसके साथ नहीं रहेगे, तब आपका प्यार ख़त्म हो जायेगा? तब उसने कहा ऐसा नहीं है? मैं पूरी तरह से उसके प्रति समर्पित हूं।,




वगैर वैवाहिक बन्धन के लड़के-लड़कियां एक साथ रहकर अपने जीवन साथी का चुनाव करना, यह भारतीय समाज के वृहत होते लोकतंत्र का परिचायक है। दूसरी तरफ माता-पिता एवं परिवार द्वारा सदियों से बच्चों की राय के बिना उनके लिए जीवन साथी चुनने की प्रक्रिया में संग्लन हैं । कुछ समाज व वर्गों में स्वतंत्र विवाह की परम्परा भी देखी है, लेकिन व्यापक स्तर पर बच्चों की मंशा को दरकिनार ही क्या जाता है। भारतीय समाज में यह देखा जाता है कि शादी में माता-पिता, परिवार की इच्छा प्रथम है। ज्यादातर अभिभावक लड़कियों के सन्दर्भ में उनकी राय तक नहीं लेते हैं, लेकिन कुछ शिक्षित परिवारों में काफी हद तक बदलाव भी आया है। वह अपने बच्चों से राय विमर्श करके उनकी इच्छाओं के अनुरूप फैसले ले भी रहे हैं। सर्वमान्य यह होना चाहिए कि अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों के मानवाधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाता है कि बहुतेरे बच्चे अपने अभिभावकों की इच्छानुसार ही अपने जीवन साथ का चुनाव करते हैं। पता नहीं, इसे हमारे समाज में बेहतर क्यों माना जाता है? जो लड़के-लड़कियां अपनी पसन्दानुसार जीवन साथी का चुनाव करते हैं, अगर अभिभावक मान जाते हैं, अगर भविष्य में उन बच्चों का विवाहिक जीवन असफल या उसमें खींचतान होती है, तब अभिभावक अपने हाथ खड़े भी करते हैं,



दूसरी तरफ बच्चों को इतना सक्षम होना बेहद जरुरी है, ताकि वह अपनी परेशानी का मुकाबल स्वयं करें, जब प्रेमी पति और प्रेमिका पत्नी बन जाने पर भी दोनों में प्रेमी और प्रेमिका का ही सम्बन्ध रहना चाहिए. लेकिन जब वहां पति और पत्नी के समबन्ध में परम्परावादी हावी हो जाता है, चाहे वह माता-पिता हो या अन्य कोई  उन्हें अपने प्रेमी और प्रेमिका वाले रिश्ते को ही अहमियत देना चाहिए, या दोनों में इतनी सूझ बूझ विकसित होनी चाहिए, जहाँ इसकी कमी आती है, वहां रिश्ता टूट जाता है. उस रिश्ते में यदि जाति, धर्म विशेष की बात कर किसी को अपमानित करने के लिए किया जाता है, तब उन दोनों को उनका डटकर जवाब भी देना चाहिए। विमर्शात्मक तथ्य यह भी है कि अभिभावकों का चयन ज्यादातर गलत ही होता, कोई कहता है कि अरेंज मेरिज सफल है, इसके पीछे का मुख्य कारण महिला परम्परावादी को स्वीकार करना ज्यादा होता है, पितृसत्ता को स्वीकार होती है । रिश्ते के सफल होने में इच्छा का अहम योगदान होता है।  

तीसरी तरफ रूढ़ीवादी, परम्परावादी व संकुचित मानसिकता के लोग सक्रिय हैं। कभी ऐसे रिश्तों को लव-जिहाद, विदेशी संस्कृति का दोष, ऑनर किलिंग के नाम पर हत्याएं कर रहे हैं। मैं इन दोनों को एक परिवर्तनवादी के तौर पर देखता हूं। अब देखना यह है कि इनका प्यार कहां तक सफल होता है, लेकिन इसका अधिकार मेरे पास या किसी के पास नहीं होना चाहिए, यह उनका व्यक्तिगत मसला है, कोई कुछ कर सकता हैं तो इनके इनके प्यार के लिए मंगलकामनाएं। मैंने उस लड़के में यह पाया कि उसमें मेल इगो नहीं है, समाज ऐसे रिश्तों को कुछ भी कहे, उसपर ध्यान देने की कुछ जरुरत होनी चाहिए, ऐसे रिश्तों स्वभाविक रूप से हमारे समाज और मानवीय हक़ को मज़बूत कर रहे हैं। 



(नोट : यह जिस लड़के पर आधारित है, उनसे मेरी यह सामान्य बातचीत, कोई साक्षात्कार नहीं है। उससे विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुयी, लेकिन मैंने सिर्फ एक पहलू पर लिखा है, यह भी हो सकता है, मेरे नज़रिये में कुछ लगती हो तो मैं उसे सुधार करूँगा)। 

सैयद परवेज़, विश्वविद्यालय संस्मरण, वर्ष 201621 मई, 2018, नई दिल्ली

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