Friday, 6 April 2018

पैसे कमाने की कला

वायलेट लाईन मैट्रो से मैं बदरपुर जा रहा था। सरिता विहार स्टेशन पहुंचने पर बैठने को सीट मिली थी। बैठने के तदोपरान्त मैंने वहां एक बीमा कम्पनी का विज्ञापन पढ़ा जो मैट्रो के अन्दर प्रचारित था। विज्ञापन कुछ यूं था कि जिन्दगी के 100 वर्ष पार करने पर भी पूर्णतः सुरक्षा लाभ। 99 वर्ष पर आठ प्रतिशत लाभ। सोचा आखिर इतने वर्षों तक जीवितों की संख्या कितनी होगी? विज्ञापन पढ़कर हंसी भी आ रही थी। मैट्रो के साथ ही पूरे बाजार तंत्र में बढ़ता पूंजीवाद देखा जा सकता है। जहां हर कोई एक दूसरे से गला काट प्रतियोगिता में है। कम्पनी के मार्केटिंग प्रबन्धन को मानना पड़ेगा। कोई भी बीमा कम्पनी एक विश्वास के साथ कागज़ ही बेचती है। मार्केटिंग में सबसे कठिन कार्य है बीमा क्योंकि यहाँ उपभोक्ता को सिर्फ एक कागल का दुकड़ा ही मिलता. उस प्रचारित विज्ञापन के सन्दर्भ में मैंने अपने बगल में बैठे एक सज्जन से बाती भी की।

उस सज्जन ने कहा-‘जीवन में सत्तर-पचहत्तर वर्ष ही ज्यादा हैं, परन्तु हमारे गांव में एक बुजुर्ग हैं, जोकि 116 वर्ष के हो चुके हैं। अब देखिए न उनके सभी बच्चे भी मर चुके हैं, लेकिन वे ठीक हैं, काम भी करते हैं।’

मैंने पूछा उन बुजुर्ग की देखभाल कौन करता है? तब उस सज्जन ने कहा-‘जी पैते वगैरह हैं न उनके।’ फिर उसने कुछ क्षण सोचते हुए कहा-‘भाई साहब ऐसा भी क्या जीना है? आदमी अपने बच्चों के सामने ही मर जाए, तभी अच्छा है।’ मैंने भी उसकी बातों में हुंकारी दी और कहा-‘आप ठीक कह रहे हैं। अब देखिए हमारे जीवन में आस-पड़ोस, स्कूल, कॉलेज आदि में मित्र व रिश्तेदार हैं। धीरे-धीरे उनमें से कुछ दशकों बाद जिनके साथ हमने बचपन, जवानी की शुरूआत की है वह मर जायेगे। जीवन का यह कटु सत्य है। इसी प्रकार हम और हमारी उम्र के लोग एक दिन मर जायेग। यदि हम जीवित रहते हैं, तब दुनिया में हमारी उम्र का कौन होगा? जिस बच्चे को हमने अपने हाथों से उठाया और खेलाया है, उसके समक्ष ही मर जाना सबसे अच्छा है।

दूसरी तरह हर कोई दुनिया में अकेला ही आया है, अकेला ही जायेगा। मुझे ज्यादा वर्षों तक जीवित रहना व्यर्थ ही लगता है। लेकिन उन व्यक्तियों की दीर्घआयु हो, जो मानवीय उत्थान के लिए कार्यरत हैं। दुनिया में ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन की कम अवधि में बड़े कार्य कर विख्यात हुए जैसे भगत सिंह। ज्यादा वर्षों तक जीवित रहना पूर्णतः व्यर्थ है।

जीवन बीमा के सन्दर्भ में उस सज्जन ने कहा-‘भाई यह बेकार की चीजे़ हैं। एक मित्र ने बहुत वर्ष पहले मुझसे कहा कि बीमा करा लो, मैंने उसकी बात न मानी। किन्तु दो हैम्बर मशीन जरूर खरीद ली।’

मैंने उससे पूछा-यह मशीन किस काम आती है? उसने कहा-‘इससे दीवार, छत, लैंटर आदि को तोड़ा जाता है। उसने आगे बताया कि वह इन मशीनों को दैनिक किराये पर देने के लिए खरीदा। एक मशीन का रोज का किराया 200 रुपये हैं। उसने यह भी कहा कि इस मशीन को छोटे-मौटे ठेकेदार व मजदूर किराये पर लेते हैं। कुछ दिनों तक कोई भी इसे किराये पर न ले गया, लेकिन जब लोगों को पता चला तो लोग उसे घर से ही ले जाते हैं। शाम को किराया और मशीन जमा करते हैं, कुछ तो महीनों-महीनों तक ले जाते हैं। उन मशीनों से मुझे अच्छी खासी आय होती है। मशीन को खरीदने की लागत से मैंने चार गुणा फायदा प्राप्त कर लिया।
उसने आगे बताया कि जब उसका यह धन्धा चल गया, तब उसने मार्बल घिसाई मशीन खरीदी। उससे भी उसे दैनिक 300 रुपये पर देता है। मैंने उससे पूछा-आपने इससे जुड़े कार्य किये होगें, तब उसने कहा कि मैंने एक भवन निर्माण ठेकेदार के यहां काम किया है, पर मैंने उसे बहुत पहले ही छोड़ दिया था। 
उसने जीवन बीमा के बारे में कहा-‘यह ठीक है, लेकिन इसमें ज्यादा पैसे फंसाना व्यर्थ है। इसमें ज्यादा पैसा फंसाकर कोई भी व्यक्ति विशेष लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। बस यह है कि अगर आप मर गये तो, शायद पैसा मिल जाए।’ उस आदमी ने आगे कहा-‘कोई सोचे कि अगर वह अपना बीमा कराने से अमीर बन जायेगा, तब उसकी सोच गलत है। अपने धन का कैसे इस्तेमाल करना है? इसकी कला व्यक्ति को आनी चाहिए। 
उसने बताया कि सन् 2001 में उसने बैंक से 40 हजार लोन लिया था। उस पैसे से ही उसने पल्ला गांव, फरीदाबार (हरियाणा) में किस्तों पर 80 गज जमीन खरीदी। उस वक्त जमीन सस्ती थी। उसने यह भी बताया कि बैंक को 30 हजार रुपये ज्यादा देने पड़े यानी कुल 70 हजार रुपये। लेकिन जब किस्त पूरी हो गई तब उसने वह जमीन बेच दी। उसने उस जमीन से तीन गुना से ज्यादा लाभ कमाया। उसने कहा कि बेची गयी जमीन से उसने 200 गज जमीन और खरीद ली। अब उसके पास चार हैम्बर मशीन और दो मार्बल घिसाई मशीन है जिसे वह दैनिक किराये पर देता है, जिससे वह अतिरिक्त आय प्राप्त कर लेता है। उसने कहा कि मशीनों में लगी पूंजी तो बरकरार है कि कोई बीमा कम्पनी क्या इतना पैसा दे सकती थी? उसने 28 हजार की दो हैम्बर मशीन को खरीदा था।

वह व्यक्ति देखने में लम्बा, उसका रंग चॉकलेटी था। उसने एक चुटिया भी रखी हुई थी। मैं तो इतना समझ ही गया था कि यह कोई ब्राह्मण है। मैट्रो स्टेशन से बाहर आने पर उसने बताया कि वह तो जैतपुर पहाड़ी में रहता है। मैंने उससे कहा कि मैं थोड़ा आगे रहता हूं, कुछ देर उसके साथ पैदल चलते हुए बातें हुईं। उसने कहा कि मैंने अपने जीवन में बहुतेरे काम किये हैं, फोटोग्राफी भी की है। मैंने पूछा की कैसी फोटोग्रामी। तब उसने बताया कि पानी से धुलाई वाली फोटोग्राफी। उसने आगे बताया कि इस काम में समय पांच-पांच घण्टे लगते थे, फिर मैंने इस काम को छोड़ दिया। उसने बताया कि इसके बाद एसी मकैनिक के रूप में काम किया। लेकिन उसमें किसी दुर्घटना में उसका एक हाथ टूट गया। फिर उसने एसी के काम को छोड़ा, क्योंकि उसके हाथ में बहुत दर्द होता था। 
मैंने पूछा कि अब आप क्या करते हैं? उसने कहा कि वह अपोलो अस्पताल में सिक्योरिटी गार्ड है। साथ ही साथ वह तो संस्कृति आचार्य भी है, वह पण्डिताई भी करता है। पण्डिताई पर मुझे एक बात याद आया कि इंडियन मैनेजमेन्ट एसोसिएशन में एक पण्डित जी हैं, जोकि वहां पर वे लाइब्रेरियन है, लेकिन पण्डिताई भी करते हैं, वह हजारो रुपये दुर्गा पूजा आदि में कमा लेते हैं। एक पण्डित ऐसे और हैं, भारतीय सामाजिक संस्थान से जो पार्ट टाईम प्रिटिंग का काम लेते हैं, वह फुल टाईम पण्डिताई करते हैं। दुर्गा पूजा में वह तो सहायक पण्डित भी रखते हैं। एक बार कि बात वे बता रहे थे कि सहायक पण्डित ऐसा मिला उनके बहुत से पैसे लेकर चम्पत हो गया। 
खैर चलते-चलते उसने मुझे सलाह भी दे डाली कि अगर आप व्यापार करना चाहते हैं तो कम पैसे में भी आप अपना व्यापार कर सकते हैं। जैस आपके पास 50 हजार रुपये हो, तो आप दो स्कूटी फाइनेंस करवाईए। और उसे किसी पिज्जा हार्ट को दे दीजिए। वह दो स्कूटी आपको महीने का 30 हजार रुपये से ज्यादा देगा। आप किस्स भी देते रहे और स्कूटी तो आपकी है ही, इसके साथ साथ आपको इनकम भी प्राप्त होगी। 
मैंने उससे पूछा-अब आप बताईए मेरी स्कूटी को पिज्जा हार्ट में कौन लगवाएगा। तब उसने कहा कि ये लीजिए मेरा फोन नम्बर, नाम भी लिखिए दिग्विजय पाण्डे। खैर कुछ भी हो उसकी आदमी में पैसे कमाने की कला जरूरी थी।

सैयद परवेज, 28 मार्च, 2018

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