~सैयद परवेज
यह बात अनुभव एवं तर्क पर आधारित है। ईश्वरीय अस्तित्व है या नहीं है इसका उत्तर
विभिन्न तर्कों द्वारा ढूँढा गया और ढूँढा जा रहा है। ईश्वरीय अस्तित्व की स्वीकृति
या अस्वीकृति मूलतः यह अनुभव/अनुभूति पर आधारित है। हम अपने बड़ों से सुनते आये हैं
कि गांव के उस तरफ एक बरगद/पीपल वृक्ष के नीचे रात को एक भूत दिखता था, जो लोगों से खैनी, बीड़ी मांगता। न देने पर लोगों को पटक देता। ऐसी बातें भारत के
ज्यादातर राज्यों, गांवों, कस्बों में सुनने को मिलती हैं। ऐसी बातें,
हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनते आ रहे हैं। जब हम उस जगह
जाते हैं और अनुभव करते हैं तब हमें वहां भूत का अहसास होने लगता है, लेकिन जिसने ऐसी कहानियां नहीं सुनी उसे न भूत दिखता
है और न ही उसका अहसास। इसप्रकार स्पष्ट है कि ईश्वर मूलतः अनुभव पर आधारित है।
धर्म मूलतः तीन चीजों टिका है जिसमें लालच, डर और आस्था। लालच का तथ्यात्मक विश्लेषण जिसमें व्यक्ति का
स्वर्ग, ईश्वरीय, धन, मान-सम्मान इत्यादि की प्राप्ति से जोड़ा जाता है। दूसरे तथ्यात्मक विश्लेषण में
नरक में जाना, जहां उसे कर्मों का
फल मिलेगा ये ही उसका एकमात्र डर है। स्वार्थवश में ही एक व्यक्ति बन्दर लेकर घूम रहा
है, अगर उसके स्वार्थ में जीविकापर्जन
है तब यह उसका दूसरा तथ्य है, लेकिन पहले तथ्य में
उसे उस बन्दर में ईश्वरी झलक दिखती है, यह बहुत ही अच्छी बात है दिखनी चाहिए यही तो इनसानियत है, यह उसका विश्वास है, लेकिन क्या उसे उससे हटकर धर्मोपासना करने वालों का गला घोंट
देना चाहिए? तब क्या उसे धर्म
का डर नहीं है? तब क्या उसे स्वर्ग
और नरक का डर नहीं? एक इनसान दूसरे इनसान
का सरेआम कत्लेआम करता, तब उसे क्या अपने
ईश्वर से डर नहीं लगता है? या ईश्वर ने ही अन्य
धर्मोंपासकों को मारने का आदेश दिया है?
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में एक तरफ सोपान क्रम में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं, जो सवर्ण माने जाते हैं, तो दूसरी तरफ अवर्ण हैं, जो इस वर्णव्यवस्था से अलग हैं, अछूत यानी दलित। इस जटिल सामाजिक व्यवस्था में जब किसी नये धर्म
का आगमन हुआ, तब शोषित जातियों
को एक आशा की किरण नज़र आई। इसका सकारात्मक प्रभाव भी उनके जीवन में पड़ा। इसके साथ-साथ
इस व्यवस्था का नशा भी उन नये अनुसरणकर्ताओं पर चढ़ा, जो उच्च जातियों से स्वार्थवश या ईश्वरीय अस्तित्व को स्वीकार
करते हुए आये। कुछ दलितों ने इस्लाम, ईसाई, सिख धर्म को अंगीकार किया,
जिसका मूल कारण यह था कि उन्हें समानता की चाह थी।
परिणामस्वरूप वे उस नये धर्म के अनुसरणकर्ता बने। लेकिन इस वर्णव्यवस्था से आये हुए
लोगों को उस नये धर्मों और उनके अंगीकारों ने उन्हें उनके मूलरूप में ही आगे की पहचान
देकर उनके साथ जातिगत भेदभाव को बनाये रखा। लोग कहते हैं कुछ हिन्दू सामन्तवादी राजपूत
इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद खान, पठान बन गये।
इसी कड़ी में हम यह देखते हैं कि कुछ दलित मुसलमान शहरों में आकर अपने नाम के आगे
खान लिखने लगे, ताकि वह इसी सोपान
क्रमिक वर्णव्यवस्था में सर्वोच्च दिख सके। यही स्थिति हिन्दू धर्म में शूद्र तबकों
में भी देखी जा जाती है, मसलन कुछ अपने को
राजपूत बताने लगे हैं। इस्लाम धर्म मूलतः समानता पर आधारित बताया जाता है, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस समानता में भी
वर्णवादी नशा दिखता है। जैसे कोई दलित इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद मुसलमान बना।
वह मुसलमान बाद में, पहले वह दलित यानी
अछूत है। मुस्लिम समाज के अन्दर भी धोबी, हलालखोर, गदहेड़ी, बक्खो, पंवरिया, मछुआरा, नालबन्द, भटियारा, गोरकन, नट, लालबेगी इत्यादि जातियां प्रचलित हैं। ये वो जातियां हैं, जो उपेक्षा की शिकार हैं और सामाजिक बराबरी पाने
के लिए संघर्ष में काफी पीछे हैं।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि भारत में तो भेदभाव था ही नहीं। मनुस्मृति में सभी बातें
गलत नहीं हैं, लेकिन लोगों ने समालोचना
ठीक से नहीं की। कुछ कहते हैं मनुस्मृति गलत है, लेकिन पूर्णतः नहीं है। एक बात यह है कि आदमी गलत होता है या
सही। कोई चीज गलत होती है या सही। उत्तर स्पष्ट होगा सही या गलत। कहते हैं भेदभाव नहीं
था-मृच्छकटिकम् नाटक में क्या बौद्धों के साथ भेदभाव का वर्णन नहीं है डॉ. साहेब के
बचपन के कटु अनुभव में भेदभाव का वर्णन नहीं है या दलित साहित्यकारों की आत्मकथा में
उनके जीवन में भेदभाव नहीं हुआ. प्रो तुलसी राम, श्योराजसिंह, नैमिशराय आदि के जीवन में उनकी आत्मकथा में वर्ण भेदभाव क्या गलत है। कुछ लोग कहते
हैं ब्राह्मण गरीब भी है बिलकुल हैं, लेकिन किसी ब्राहमण को क्या किसी ने अछूत समझा है? क्या क्षत्रियों के साथ ऐसा हुआ है? क्या उन्हें भी गाँव के बाहर रहकर मानसिक पीड़ा का सामना करना
पड़ा है? क्या किसी ब्राह्मण के हाथ
कट दिए गए हैं? क्या ब्राह्मण बच्चे
को नदी या पोखरे में नहाने नहीं करने दिया गया है।
अभी भीमा-कोरेगांव अस्मितामूलक युद्ध की 200 सालगिरह मनाई गई। सवर्णवादी मानसिकता वाले इसे देशद्रोही घोषित
करते हैं। कहते हैं कि यह तो अंग्रेजों की विजय थी, इसे मनाना देशद्रोह है। उनसे प्रश्न है आखिर इसे देशद्रोह क्यों
मानना चाहिए? जिस वर्णवादी व्यवस्था
ने सदियों तक दलितों पर अमानवीय कुकृत्य किये, क्या वे देशद्रोही नहीं थे? दूसरी तरफ देशभक्त आखिर किसे कहा जाये? टीपू सुल्तान भी तो अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे
गये, लेकिन यह सवर्णवादी उन्हें
भी देशद्रोही और कत्लेआम करने वाला घोषित करते हैं। क्या ब्राह्मणवाद की सेवा करना
ही देशभक्त है? क्या दलित इनसान नहीं
हैं? फिर प्रश्न यह भी है कि राष्ट्र
क्या है? क्या राष्ट्रीयता के बिना
राष्ट्र सम्भव है? समझना चाहिए कि राष्ट्र
एक व्यापक शब्द है, जहां प्रत्येक नागरिक
के साथ समानता हो, कोई भी व्यक्ति शोषित
न हो। क्या स्वतन्त्रता पूर्व कभी ऐसी स्थिति भारत में रही?

भीमा-कोरेगांव युद्ध में 1 जनवरी,
1818 को ईस्ट इंडिया कम्पनी की
एक छोटी-सी टुकड़ी ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की बड़ी सेना को बुरी तरह पराजित किया था,
परिणामतः पेशवा राज्य की समाप्ति हुई। इस लड़ाई में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरफ से लड़े सैनिक महाराष्ट्र की महार जाति से थे। पेशवाओं के
शासनकाल में अछूतों यानी दलितों के साथ अमानवीयता की सीमा उफान पर थी। जब सड़कों पर
सवर्ण चल रहे होते थे, तो अछूतों को चलने
की अनुमति न थी। अछूत को अपनी कलाई या गले में निशान के तौर पर एक काला डोरा बांधना
पड़ता था, ताकि हिन्दू उनसे दूरी बनाये
रखें और उन्हें आसानी से पहचाना जा सके। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूतों के लिए
नियम था कि वे कमर में झाडू बांधकर चले, ताकि उनके चलने से जमीन पर पड़े पैरों के निशान मिट जाए और कोई हिन्दू उन चिन्हों
पर पैर रखने से अपवित्र न हो जाए। साथ ही, अछूतों को अपने गले में मिट्टी की हाड़ी लटका कर चलना पड़ता था, ताकि वे उस हाड़ी में ही थूकें। अछूतों के साथ ऐसे
अमानवीय कुकृत्य सदियों तक रहे। भीमा-कोरेगांव युद्ध एक दर्शन का परिचायक है,
जो देश और राष्ट्र की अवधारणा को तोड़ती है। यह इस
बात का संकेत है कि मनुष्य और मनुष्यता से बढ़कर कुछ नहीं है। जब कोई शासक अपने देश
के नागरिकों को इनसान का दर्जा देना बन्द कर देता है, तब राष्ट्र की अवधारणा फ्लॉप हो जाती है, वहां अस्मिता का प्रश्न पहले होता, बाद में राष्ट्र।