Monday, 29 January 2018

“मानव विकास के लिए नहीं बल्कि मानव के लिए विकास होना चाहिए-उपेंद्र बक्शी


 मानव विकास के लिए नहीं बल्कि मानव के लिए विकास होना चाहिए। यह बात भारतीय सामाजिक संस्थान नई दिल्ली में 25 जनवरी 2018 को  उपेंद्र बक्शी ने फादर पॉल डे ला गुरेवियेरे स्मृति व्याख्यान मे कही। श्री बक्शी ने जो दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और कानूनी विशषज्ञ हैं। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि लोकतन्त्र पर नित-नए खतरे और संकट झेलने पड़ रहे हैं। किन्तु मोहनदास करमचंद गांधी ने शिक्षा दी है कि हमें असहमति भी एक तरह से असहिष्णुता है। देश के हर नागरिक को अपनी बात रखने के लिए आमरण अनशन का अधिकार है, किन्तु यह सरकार की भी ज़िम्मेदारी है कि वह यह सोचे कि यदि कोई व्यक्ति उससे सहमत नहीं है इसलिए वह दबाव बनाने के लिए आत्महत्या का रास्ता चुनता है तो क्या उसे ऐसा करने दिया जाना चाहिए। जिसे हम सभ्य समाज कहते हैं वह बर्बर समाज का ही एक परिष्कृत रूप है। और सिविल सोसाइटी और एविल सोसाइटी से ही निकली है।
एक एक्टिस्विस्ट को अपने संघर्ष को इस उम्मीद मे ही नहीं करना चाहिए कि उसे सफलता मिलेगी बल्कि इस चाहत मे करना चाहिए कि भले इस इसमे हार है वह अपनी कोशिश से पीछे नहीं हटेगा। जब अफ्रीका मे रंग भेद के खिलाफ नेल्सन मंडेला ने आगाज किया तो इसमे सफलता की उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी लेकिन 27 साल के कड़े संघर्ष के बाद रंगभेद से पूरी तरह मुक्ति मिली। एक्टिविस्त को इसलिए संघर्ष नहीं करना चाहिए कि उसे तत्काल लाभ मिले बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी न्याय से वंचित न रह सके।
आज जब हम गरीबी की बात करते हैं तो हमे यह भी समझना होगा कि कोई पैदाइशी गरीब नहीं होता बल्कि सरकारी नीतियां किसी को गरीब बनाता है। आधार अनिवार्यता का मज़ाक बनाते हुए उन्होने कहा कि जिसके पास आधार नहीं है वह बिलकुल निराधार है। और इस कार्ड के न होने से कितने ही लोगो को भुखमरी से अपनी जान तक गवानी पड़ी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय की वकील डॉ उषा रामानाथन ने की एवं इसका संचालन श्रेया जेसिका धान ने किया। कार्यक्रम मे संस्थान प्रमुख डॉ डेंजिल फर्नांडीस ने अतिथि का स्वागत स्मृति चिन्ह और स्टाल भेंट कर किया। धन्यवाद प्रस्ताव राजीव कपूर  ने दिया। 

Deliberative democracy and authoritarian statism are two contradictory forces; they cannot exist in harmony-Upendra Baxi


“Deliberative democracy and authoritarian statism are two contradictory forces; they cannot exist in harmony”, remarked Dr. Upendra Baxi, a renowned legal scholar, professor of law and former Vice Chancellor of University of South Gujarat while delivering a lecture at the Sixth Fr. Paul de La Gueriviere Memorial Lecture this evening at Indian Social Institute, New Delhi. Speaking before a distinguished audience of academicians and social activists on the topic “Deliberative Democracy v Authoritarian Statism: Traite sur la tolerance- Dialogue, Dissent, and Civic Virtue”, he recalled that for Fr. Paul ‘G’ the grassroots realities of the people, their struggles and rights were central to policy making and development.
While enumerating the various traits of tolerance, the renowned legal scholar pointed out that ‘one must understand, and be with, the social suffering which builds and sustains ‘pyramids of sacrifice’ to power; but that is probably what also animates the dream of converting ‘swords into ploughshares’. He highlighted that for toleration one must confront the pessimism of the will by optimism of the intellect. The Padmashri recipient emphasized that toleration is not a religious or social virtue but it is a virtue which is political in nature. It is a political virtue to achieve the other results. Putting differently, the political or the governing, elite owe an ethical and constitutional obligation to convert governance into a programme of zero-sum toleration of tendencies in civil society towards violent intolerant practices, whether based on religion, caste, creed, color, gender, or history and geography. Toleration is an instrument of governance. It is a secular civic virtue of individuals and it is also a relational virtue, meaning thereby, the self needs the other and the other needs the self. In today’s India, toleration is very necessary to attain democratic pluralism. Speaking about the importance of the virtue of toleration, Dr. Baxi stressed that the dark side of tolerance is violence and referring to Gandhiji, he pointed out that a true ‘Satyagrahi’ will first stress on his or her duties as are enunciated in the Constitution of India and would not engage in violence. Dr. Usha Ramanathan, Advocate, Supreme Court of India and an internationally recognized expert on law, chaired the function. Dr. Denzil Fernandes, Executive Director, Indian Social Institute, extended a warm welcome to all the distinguished dignitaries and highlighted the key contributions of Fr. Paul ‘G’ for the growth of the Institute as well as for the society at large.

This lecture was instituted in 2012 in memory of Fr. Paul de La Gueriviere (1920-2011), a Jesuit of French origin, who worked tirelessly throughout his life to promote the awareness of the stark social realities in India among youth and academicians throughout the country. After being a factory worker and serving the French Army during the Second World War, he left his native country for India in 1947 to spend the rest of his life striving to bring issues the marginalized sections of society into the academic discourse, especially during the last three and a half decades of service in Documentation Centres of Indian Social Institutes in Bangalore and New Delhi.

डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय University के UG & PG उपाधि में सम्मिलित किया जाये

एक व्यक्ति जिस धर्म का वह अनुसरण और अनुपालन कर रहा है, लेकिन अन्य किसी धर्म को वह मान्यता नहीं देता या उसका अनुसरण नहीं करता, तब क्या उसके साथ अनहोनी होती है। सोचने की बात है कि जैसे कोई मूर्ति पूजा करता, लेकिन वह निरकार को नहीं मानता, तब क्या उसके साथ अनहोनी हो रही है। कोई मूर्ति पूजा नहीं कर रहा वह निरकार ईश्वर की आराधना कर रहा है, तब क्या उसे साथ अनहोनी हो रही है। तीसरा एक नास्तिक हैं जो किसी भगवान को नहीं मान रहे, तब क्या उनके साथ भी कोई भगवान अनहोनी करवा रहा है, बिलकुल नहीं। पर क्या बिडम्बना है एक भगवान को खुश करने के लिए, लोग दूसरे भगवान की आराधना करने वाले को मार रहें हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उनके भगवान खुश होंगे। जब नमाज पढ़ने वाले लोग, मूर्ति पूजा नहीं करते, तब क्या उनके साथ कोई भगवान अनहोनी नहीं करवाता है। जब मूर्ति पूजा करने वाले, नमाज को नहीं मानते, आराधना पद्धित को नहीं मानते, तब क्या कोई भगवान उनके साथ भी अनहोनी करवाता है। निष्कर्ष यहाँ व्यक्ति की अपनी आत्मसंतुष्टि ज्यादा महत्व रखती है। इसलिए डॉ अम्बेडकर भगवान से पहले मानव को मानवता के दायरे में रहने की प्रेरणा देते हैं ।
‘डॉ. अम्बेडकर के चिन्तन को वाद कहना इसलिए सटीक व सार्थक है कि यह दर्शन व्यक्ति तके रूप में उनकी वैचारिक अवधारणाओं का एकीकृत ढांचा ही न होकर भारतीय सन्दर्भ में उस महान चेतना का निचोड़ है जिसे हम भौतिकवादी दर्शन परम्परा कहते हैं और जिसके केन्द्र में सदैव मनुष्य रहा है। यह दर्शन परम्परा चार्वाक-लोकायत, बुद्ध, नाथ-सिद्ध एवं भक्तिकालीन संत-सूफियों के महान अवदान को आधुनिक काल से जोड़ती है। लोहियावादी समाजवाद, गांधीवाद मानवतावाद एवं वर्गविहीन-शोषणविहीन समाज का स्पप्न देखने वाले मार्क्सवाद की जड़ें प्रत्यक्ष व पराक्ष रूप से इस भारतीय दर्शन परम्परा से जुड़ी हुई हैं, फिर भी अम्बेडकरवाद इन तीनों विचारधारों से स्वयं को पृथक रखता है। इसकी मूल वजह यह है कि लोहिया, गांधी एवं भारतीय मार्क्सवादी कहीं-न-कहीं अंततः सवर्ण मानसिकता के प्रभाव में दिखाई देते हैं।’ 1 हरिराम मीणा, युद्धरत आम आदमी, पृ.-56, अप्रैल-जून 2003,
डॉ. अम्बेडकरवाद तर्क पर आधारित है, जो समानता एवं समता की बात करता है। मानव सभ्यता को सुचारू रूप से और सही दिशा में चलने के लिए जरुरत है डॉ. अम्बेडकर को छात्र पूरा पढ़े.  
https://www.change.org/p/university-and-dr-ambedkar-सम्पूर्ण-वाङ्मय-को-university-के-ug-pg-उपाधि-में-सम्मिलित-किया-जाये-79a8e8d5-6bd5-4a28-b3f4-d82b89ba86c5

Tuesday, 16 January 2018

धर्म और जाति से बड़ी है इनसानियत

~सैयद परवेज
यह बात अनुभव एवं तर्क पर आधारित है। ईश्वरीय अस्तित्व है या नहीं है इसका उत्तर विभिन्न तर्कों द्वारा ढूँढा गया और ढूँढा जा रहा है। ईश्वरीय अस्तित्व की स्वीकृति या अस्वीकृति मूलतः यह अनुभव/अनुभूति पर आधारित है। हम अपने बड़ों से सुनते आये हैं कि गांव के उस तरफ एक बरगद/पीपल वृक्ष के नीचे रात को एक भूत दिखता था, जो लोगों से खैनी, बीड़ी मांगता। न देने पर लोगों को पटक देता। ऐसी बातें भारत के ज्यादातर राज्यों, गांवों, कस्बों में सुनने को मिलती हैं। ऐसी बातें, हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनते आ रहे हैं। जब हम उस जगह जाते हैं और अनुभव करते हैं तब हमें वहां भूत का अहसास होने लगता है, लेकिन जिसने ऐसी कहानियां नहीं सुनी उसे न भूत दिखता है और न ही उसका अहसास। इसप्रकार स्पष्ट है कि ईश्वर मूलतः अनुभव पर आधारित है।
धर्म मूलतः तीन चीजों टिका है जिसमें लालच, डर और आस्था। लालच का तथ्यात्मक विश्लेषण जिसमें व्यक्ति का स्वर्ग, ईश्वरीय, धन, मान-सम्मान इत्यादि की प्राप्ति से जोड़ा जाता है। दूसरे तथ्यात्मक विश्लेषण में नरक में जाना, जहां उसे कर्मों का फल मिलेगा ये ही उसका एकमात्र डर है। स्वार्थवश में ही एक व्यक्ति बन्दर लेकर घूम रहा है, अगर उसके स्वार्थ में जीविकापर्जन है तब यह उसका दूसरा तथ्य है, लेकिन पहले तथ्य में उसे उस बन्दर में ईश्वरी झलक दिखती है, यह बहुत ही अच्छी बात है दिखनी चाहिए यही तो इनसानियत है, यह उसका विश्वास है, लेकिन क्या उसे उससे हटकर धर्मोपासना करने वालों का गला घोंट देना चाहिए? तब क्या उसे धर्म का डर नहीं है? तब क्या उसे स्वर्ग और नरक का डर नहीं? एक इनसान दूसरे इनसान का सरेआम कत्लेआम करता, तब उसे क्या अपने ईश्वर से डर नहीं लगता है? या ईश्वर ने ही अन्य धर्मोंपासकों को मारने का आदेश दिया है?   

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में एक तरफ सोपान क्रम में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं, जो सवर्ण माने जाते हैं, तो दूसरी तरफ अवर्ण हैं, जो इस वर्णव्यवस्था से अलग हैं, अछूत यानी दलित। इस जटिल सामाजिक व्यवस्था में जब किसी नये धर्म का आगमन हुआ, तब शोषित जातियों को एक आशा की किरण नज़र आई। इसका सकारात्मक प्रभाव भी उनके जीवन में पड़ा। इसके साथ-साथ इस व्यवस्था का नशा भी उन नये अनुसरणकर्ताओं पर चढ़ा, जो उच्च जातियों से स्वार्थवश या ईश्वरीय अस्तित्व को स्वीकार करते हुए आये। कुछ दलितों ने इस्लाम, ईसाई, सिख धर्म को अंगीकार किया, जिसका मूल कारण यह था कि उन्हें समानता की चाह थी। परिणामस्वरूप वे उस नये धर्म के अनुसरणकर्ता बने। लेकिन इस वर्णव्यवस्था से आये हुए लोगों को उस नये धर्मों और उनके अंगीकारों ने उन्हें उनके मूलरूप में ही आगे की पहचान देकर उनके साथ जातिगत भेदभाव को बनाये रखा। लोग कहते हैं कुछ हिन्दू सामन्तवादी राजपूत इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद खान, पठान बन गये।

इसी कड़ी में हम यह देखते हैं कि कुछ दलित मुसलमान शहरों में आकर अपने नाम के आगे खान लिखने लगे, ताकि वह इसी सोपान क्रमिक वर्णव्यवस्था में सर्वोच्च दिख सके। यही स्थिति हिन्दू धर्म में शूद्र तबकों में भी देखी जा जाती है, मसलन कुछ अपने को राजपूत बताने लगे हैं। इस्लाम धर्म मूलतः समानता पर आधारित बताया जाता है, लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस समानता में भी वर्णवादी नशा दिखता है। जैसे कोई दलित इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद मुसलमान बना। वह मुसलमान बाद में, पहले वह दलित यानी अछूत है। मुस्लिम समाज के अन्दर भी धोबी, हलालखोर, गदहेड़ी, बक्खो, पंवरिया, मछुआरा, नालबन्द, भटियारा, गोरकन, नट, लालबेगी इत्यादि जातियां प्रचलित हैं। ये वो जातियां हैं, जो उपेक्षा की शिकार हैं और सामाजिक बराबरी पाने के लिए संघर्ष में काफी पीछे हैं।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि भारत में तो भेदभाव था ही नहीं। मनुस्मृति में सभी बातें गलत नहीं हैं, लेकिन लोगों ने समालोचना ठीक से नहीं की। कुछ कहते हैं मनुस्मृति गलत है, लेकिन पूर्णतः नहीं है। एक बात यह है कि आदमी गलत होता है या सही। कोई चीज गलत होती है या सही। उत्तर स्पष्ट होगा सही या गलत। कहते हैं भेदभाव नहीं था-मृच्छकटिकम् नाटक में क्या बौद्धों के साथ भेदभाव का वर्णन नहीं है डॉ. साहेब के बचपन के कटु अनुभव में भेदभाव का वर्णन नहीं है या दलित साहित्यकारों की आत्मकथा में उनके जीवन में भेदभाव नहीं हुआ. प्रो तुलसी राम, श्योराजसिंह, नैमिशराय आदि के जीवन में उनकी आत्मकथा में वर्ण भेदभाव क्या गलत है। कुछ लोग कहते हैं ब्राह्मण गरीब भी है बिलकुल हैं, लेकिन किसी ब्राहमण को क्या किसी ने अछूत समझा है? क्या क्षत्रियों के साथ ऐसा हुआ है? क्या उन्हें भी गाँव के बाहर रहकर मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा है? क्या किसी ब्राह्मण के हाथ कट दिए गए हैं? क्या ब्राह्मण बच्चे को नदी या पोखरे में नहाने नहीं करने दिया गया है।

अभी भीमा-कोरेगांव अस्मितामूलक युद्ध की 200 सालगिरह मनाई गई। सवर्णवादी मानसिकता वाले इसे देशद्रोही घोषित करते हैं। कहते हैं कि यह तो अंग्रेजों की विजय थी, इसे मनाना देशद्रोह है। उनसे प्रश्न है आखिर इसे देशद्रोह क्यों मानना चाहिए? जिस वर्णवादी व्यवस्था ने सदियों तक दलितों पर अमानवीय कुकृत्य किये, क्या वे देशद्रोही नहीं थे? दूसरी तरफ देशभक्त आखिर किसे कहा जाये? टीपू सुल्तान भी तो अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे गये, लेकिन यह सवर्णवादी उन्हें भी देशद्रोही और कत्लेआम करने वाला घोषित करते हैं। क्या ब्राह्मणवाद की सेवा करना ही देशभक्त है? क्या दलित इनसान नहीं हैं? फिर प्रश्न यह भी है कि राष्ट्र क्या है? क्या राष्ट्रीयता के बिना राष्ट्र सम्भव है? समझना चाहिए कि राष्ट्र एक व्यापक शब्द है, जहां प्रत्येक नागरिक के साथ समानता हो, कोई भी व्यक्ति शोषित न हो। क्या स्वतन्त्रता पूर्व कभी ऐसी स्थिति भारत में रही?



भीमा-कोरेगांव युद्ध में 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कम्पनी की एक छोटी-सी टुकड़ी ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की बड़ी सेना को बुरी तरह पराजित किया था, परिणामतः पेशवा राज्य की समाप्ति हुई। इस लड़ाई में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तरफ से लड़े सैनिक महाराष्ट्र की महार जाति से थे। पेशवाओं के शासनकाल में अछूतों यानी दलितों के साथ अमानवीयता की सीमा उफान पर थी। जब सड़कों पर सवर्ण चल रहे होते थे, तो अछूतों को चलने की अनुमति न थी। अछूत को अपनी कलाई या गले में निशान के तौर पर एक काला डोरा बांधना पड़ता था, ताकि हिन्दू उनसे दूरी बनाये रखें और उन्हें आसानी से पहचाना जा सके। पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूतों के लिए नियम था कि वे कमर में झाडू बांधकर चले, ताकि उनके चलने से जमीन पर पड़े पैरों के निशान मिट जाए और कोई हिन्दू उन चिन्हों पर पैर रखने से अपवित्र न हो जाए। साथ ही, अछूतों को अपने गले में मिट्टी की हाड़ी लटका कर चलना पड़ता था, ताकि वे उस हाड़ी में ही थूकें। अछूतों के साथ ऐसे अमानवीय कुकृत्य सदियों तक रहे। भीमा-कोरेगांव युद्ध एक दर्शन का परिचायक है, जो देश और राष्ट्र की अवधारणा को तोड़ती है। यह इस बात का संकेत है कि मनुष्य और मनुष्यता से बढ़कर कुछ नहीं है। जब कोई शासक अपने देश के नागरिकों को इनसान का दर्जा देना बन्द कर देता है, तब राष्ट्र की अवधारणा फ्लॉप हो जाती है, वहां अस्मिता का प्रश्न पहले होता, बाद में राष्ट्र। 

Thursday, 11 January 2018

बेतिया के कुछ पल

~सैयद परवेज़ 
5 जनवरी, 2017 को मैं बिहार एसएससी की परीक्षा देने के लिए बेतिया में था। परीक्षा केन्द्र पहुंचने के लिए ऑटो लिया। रास्ते में ही कुछ और भी परीक्षार्थी उस ऑटो में बैठे। उनमें कुछ ऐसे भी दिखे जिनके वाट्सएप पर एसएससी के प्रश्न-पत्र के जवाब भी आ रहे थे। उनमें से मैंने एक से बात की, उसने कहा कि भाई पैसा खर्च हुआ है। मुझे यह सब अफवाह ही लग रहा था। परीक्षा केन्द्र के बाहर भी प्रश्न-पत्र लीक होने की खबर थी। वहां उपस्थित कुछ परीक्षार्थियों से इस बाबत उनसे बातें भी हुईं। चिन्तित हुआ, सोचा वेवजह ही यहां आ गया। खैर भागवत् गीतानुसार-जो हुआ, वह अच्छा हुआ। जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा को सार्थक माना।
दूसरी तरफ परीक्षा केन्द्र भी सरस्वती शिशु विद्या मन्दिर था। ऐसे स्कूल में आना मेरे जीवन का पहला अनुभव था। क्योंकि वहां स्वयं और अन्य बच्चों के प्रति असुरक्षा, तकलीफ देह, धर्म विभेदिता की बात स्पष्टतः थी। स्कूल की दीवारों, कक्षाओं में गाय वध नहीं करना चाहिए? जयप्रकाश नारायण ने कहा आदि विद्वानों के अद्धरण लिखे थे। प्रश्न उत्पन्न है विमर्श जारी है। क्या यह सब बच्चों को बताना आवश्यक है?
परीक्षा के बाद एक चाय का ठेला देखकर रूका। वहां एक वृद्ध था जिसके पांव मैले, चप्पल टूटी, कपड़े मैले। वह एक छोटी बच्ची के साथ बैठा था। पूछने पर बताया कि उसकी पोती है। उसने मुझे प्लास्टिक के गिलास में चाय दिया। मैंने कहा-बाबा आजकल चाय कुल्हड़ में नहीं मिल रही है। उसने कहा-हम तो कुल्हड़ बनाते ही थे। अब न डिमाण्ड रही न ही लोगों का रूझान। यह प्लास्टिक तो बहुत ही हानिकारक है। वर्षों तक यह धरती में नहीं गलेगी। उसने कहा-जब लालूजी रेलमंत्री थे, तब इसका प्रचलन बढ़ा था। मैंने पूछा-बाबा क्या आप घड़े भी हैं। उसने कहा-हां जी। हम पड़ित लोग हैं। मैंने कहा-पण्ड़ित होता है बाबा, पड़ित क्या? तब उसने कहा-नहीं, तीन धागा वाला पण्ड़ित। एक धागा वाला पड़ित। आजकल लोग पड़ित को प्रजापति भी कहते हैं।
मैंने आगे पूछा-आप कहां रहते हैं? तब उसने अपना व अपने भाईयों के अच्छे खासे घर दिखाये। उसका घर तो उसके ठेले के बिलकुल पीछे तीन मंजिला था। घर देखकर लगा कि वह घर से तो गरीब नहीं लगा रहा। लेकिन वह ऐसी अवस्था में क्यूं है, कारण भी कई हो सकते हैं। दिल्ली में मैंने कुछ लोगों को देखा है, जो जानबूझकर झुग्गी में कब्जा जमाने के लिए रहते हैं। जबकि उनके दिल्ली के कॉलोनियों में प्लॉट या घर हैं। लेकिन कुछ मजबूरी में भी रहते हैं। जैसे कुछ मजबूरी में भीख मांगते हैं, कुछ पेशा बनाकर। कुछ लोगों की दीनहीन गरीब दिखने की आदत भी होती है।
बेतिया में क्या प्रसिद्ध है? बाबा तब उसने राजदेवड़ी और काली मन्दिर के बारे में बताया। राजदेवड़ी सुनकर लगा जैसे कोई मिठाई। उसके बताये अनुसार-राजदेवड़ी पहुंचा फिर सोचा कि कहां आ गया? वहां एक नव-निर्मित पार्क दिखा। पार्क के बाहर उसमें घूमने का शुल्क व दिशा-निर्देश का बोर्ड दिखा। एक पान वाले से पूछा-भाई साहब यह राजदेवड़ी क्या है? उसने बताया-राज मतलब राजा। देवड़ी मतलब किया। यानी राजा का किला। उसने बेतिया के राजा हरिन्द्र किशोर के बारे में बताया। उनके घर का टूटेफूटे कुछ अवशेष और जर्जर इमारत देखी। जिसमें बिहार सरकार का कार्यालय है। उसने काली मन्दिर के बारे में भी बताया कि किसी जमाने में राजा की रानी महल के अन्दर से ही स्नान करने तालाब जाती थी। मैंने बेतिया में एक बात अनुभव किया कि बेतिया के लोगों में महारानी जानकी कुंवर और राजा हरिन्द्र किशोर के प्रति आज भी आदर भाव है।
काली मन्दिर तालब के किनारे खड़े एक नवयुवक को देखकर। मैंने पूछा-यह मन्दिर काफी पुराना है। तब उसने बताया कि यह मन्दिर राजा हरिन्द किशोर ने बनवाया था। रानी जानकी ‘कुंवर’ के बारे में बताया। फिर उसने यह भी कहा-‘कुंवर’ वे लोग लगाते हैं, जिनका पति मर गया हो, या पत्नी मर गयी हो। उसने अपना नाम मण्टू बिहारी बताया। नाम के साथ बिहारी लिखने का तर्क दिया कि लोग स्वयं को बिहारी बताना अपमान समझते हैं, लेकिन मेरे लिए यह गर्व की बात है। हमारे शहर के प्रकाश झा भी हैं, जो बेहतरीन फिल्म निदेशक हैं। उसने बताया कि वह भोजपुरी गीत व पटकथा भी लिखता है। भोजपुरी गीत व संगीत को वृहद ऊंचाई पर ले जाना चाहता है। उसने यह भी कहा कि कुछ लोगों ने भोजपुरी संगीत को अश्लील और हंसी का पात्र बना दिया है। उसने आगे कहा कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी भी करना चाहता है। फिर उसने पूछा-क्या दलित छात्रों के प्रवेश में वहां कोई बाधा है। मैंने कहा-हर जगह कुछ लोग होते हैं, जो दलित छात्रों पर व्यंग्य कर देते है। यह तो मैंने भी सुना है, खैर घबड़ाने की कोई बात नहीं है। जितनी आरक्षित सीटें आपके लिए हैं, उससे कई गुणा ज्यादा अनारक्षित सीटें भी होती हैं। उसने कहा-हमारे यहां एस.सी. छात्रों को सिविल कहकर अपमानित किया जाता है। जैसे आर्मी वाले आम जनता को सिविल्यन कहते हैं, यानी वे आम जनता को अपने से अलग समझते हैं। उसी तरह यहां के सवर्ण हमें अपने से अलग समझते हुए सिविल कहते हैं। विमर्श यह है कि अनुसूचित जाति के साथ शोषण के हथियार, उत्पीड़ने की शब्दावली बदल रही है। किन्तु शोषण नहीं बदला है, अस्पृश्य, से लेकर चण्डाल या शूडू अब सिविल कहकर उन्हें अपमानित ही किया जा रहा है। जब मैं बेतिया से दिल्ली आया सुना कि बिहार सरकार ने बिहार कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा को रद्द कर दिया है।
चलते-चलते
बेतिया बिहार राज्य का पश्चिमी चम्पारण जिले का मशहूर शहर है। यह भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है। चम्पारण वही जगह है जहां से महात्मा गांधी ने सत्याग्रह आन्दोलन की शुरूआत की थी। बेतिया शब्द बेंत यानी छड़ी से व्युत्पन्न हुआ है। ब्रिटिश शासन के दौरान बेतिया जमीन्दारी राज की दूसरी सबसे बड़ी व्यवस्था थी।

Wednesday, 10 January 2018

प्रो. संजीव कुमार से मेरी पहली मुलकात



दायें प्रो. संजीव कुमार 
प्रो. संजीव कुमार से मेरी पहली मुलकात, वर्ष 2003-2004 में हुई थी। जब मैं देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन के लिए गया था। 
संजीव सर के बारे में दयाल सिंह कॉलेज की एक हिन्दी प्राध्यापक ने मुझसे बताया था-‘तुम देशबंधु जाओ, वह तुम्हारे घर के नज़दीक भी पड़ेगा, उस कॉलेज में संजीव हैं, वे हमारे स्टूडेंट थे। वे तुम्हारी कुछ सहायता करेंगे । उन्होंने अपना नाम क्या बताया? देशबंधु छोड़कर, कुछ याद न रहा। उन शिक्षका की बात पर मैंने उस पल सोचा, यहाँ तो यह सुन ही नहीं रहीं हैं, वहां क्या होगा? क्योंकि मैं एडमिशन को लेकर बहुत परेशान था। उस शिक्षका की बात मैंने ठीक से न सुनी, जैसे उन्होंने मेरी बात। उस वक्त मेरे साथ एक मित्र था, उसे बहुत जल्दी थी, आई.टी.आई. हजरत निजामुद्दीन से एडमिशन फॉर्म लेने की। मैंने उसके कहा रुक यार, अभी और किसी शिक्षक से मिलते हैं। वह रुका भी, लेकिन ज्यादा न रुका। फिर मुझे लगा कि पहले इसका आई.टी.आई. में एडमिशन फॉर्म लिया जाए। जब मैं घर पंहुचा और सोचा कि मुझे उस शिक्षका से कुछ निवेदन करना चाहिए था। पता नहीं क्यों मित्र मनोज को अपने साथ ले गया, उसने मुझे हड़बड़ा दिया था।

दूसरे दिन मैं एक अन्य लड़के के साथ में देशबंधु कॉलेज पंहुचा। इस लडके से मेरी मुलाकात गली के मोड़ पर लगे उस सरकारी हैण्ड पम्प पर हुई, जहाँ से मैं प्रति-दिन पानी भरता था। वह लड़का बिहार के दरभंगा से था, उसके कुछ रिश्तेदार बदरपुर में रहते थे। उसने बताया कि वह जूलॉजी विज्ञान बी.एस.सी. में एडमिशन लेना चाहता है। जब हम दोनों देशबंधु कॉलेज पंहुचे, वहां बहुत भीड़ थी। सबसे पहले हमने फॉर्म लिया। उसे विज्ञान और मुझे हिन्दी में प्रवेश लेना था। हम पूछते-पूछते हिन्दी विभाग में आये, वहां दो लोगों से मुलाकात हुई, एक थे संजीव सर, उनके साथ एक और शिक्षक बैठे थे, मुझे न उनका नाम याद है और न शक्ल। संजीव सर का नाम भी मुझे पूरी तरह याद न था। उन्होंने मेरी मार्क्सशीट देखी और कहा तुम्हारे पास तो 12वीं में तो हिन्दी है ही नहीं, एडमिशन कैसे होगा? उन्होंने कहा-ऐसा करो तुम बीए इतिहास में ले एडमिशन ले लो। इतिहास विभाग में गया, तो वहां बेस्ट फॉर मार्क्स कम हो गए। मुझे ऐसा लगा कि यह मूछं वाले सर मेरी मदद नहीं करना चाहते, फॉर्म तो मैंने ले लिया था, कांउटर पर वापस किया। साथ में गये उस लड़के का भी एडमिशन नहीं हुआ, शायद वहां जूलॉजी विज्ञान बी.एस.सी. का विभाग ही न था। मैं दुबारा घर आ गया।


फिर मैंने और दिल्ली विश्वविद्यालय के रेगुलर में एडमिशन न लिया। वर्ष 2006-2007 तक में स्नातक हो चुका था। रोजगार की तलाश भी थी, 6 महीने एक वकील के पास और 1 वर्ष एक प्राइवेट स्कूल में बतौर शिक्षक रहा। मुझे लगा कि यह मैं क्या कर रहा हूँ। वर्ष 2008 में मैंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक हरियाणा में एम.ए.हिंदी में प्रवेश लिया। इसके बाद मैंने पत्रकारिता में डिप्लोमा के लिए हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, में एडमिशन लिया। इस डिप्लोमा की कक्षाएं सप्ताह में चार दिन ही लगाती थीं। इसमें कुछ शिक्षक अन्य विश्वविद्यालय/संस्थानों से बतौर अतिथि पढ़ाने आते थे। एक दिन कक्षा लेने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय से एक शिक्षक आये, मुझे लगा कि मैंने इन्हें देखा है। कक्षा समाप्त हुई, मैंने उनसे कहा-सर आपसे देशबंधु कॉलेज मुलाकात हुई थी। उन्होंने कहा-जब मैं कक्षा ले रहा था, तब मुझे भी लगा कि इसको कहाँ देखा है। फिर मैंने उन्हें बताया कि एक बार मैं आपके कॉलेज में एडमिशन के लिए आया था, परन्तु एडमिशन न हो सका। इसके बाद संजीव सर से दुबारा मुलाकात वर्ष 2013 में हुई, जब मैं किसी प्रकाशक के यहाँ काम करता था। उसी दौरान एक बार मीठापुर, बदरपुर कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के ऑफिस में भी हुई थी। संजीव सर एक बेहतरीन आलोचक हैं और किसी बात को बहुत गहराई के साथ समझते हैं। इनमें सादगी है, बेबाक ढंग से किसी बात को कहते हैं। उनसे कभी-कभार मुलाकात होती है तो मित्र की भांति मिलते हैं और बातें करते हैं। इस सप्ताह इनसे मिलकर अच्छा लगा। (संस्मरण-1 का अंश)~सैयद परवेज़ 

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु सैयद परवेज़ बीते सितम्बर 2023 र्मैंने हरियाणा के सोहना जिले में स्थित ‘ धम्म सोता ’ केंद्र में 10 दिवस...