प्रो. संजीव कुमार से मेरी पहली मुलकात, वर्ष 2003-2004 में हुई थी। जब मैं देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन के लिए गया था।
संजीव सर के बारे में दयाल सिंह कॉलेज की एक हिन्दी प्राध्यापक ने मुझसे बताया था-‘तुम देशबंधु जाओ, वह तुम्हारे घर के नज़दीक भी पड़ेगा, उस कॉलेज में संजीव हैं, वे हमारे स्टूडेंट थे। वे तुम्हारी कुछ सहायता करेंगे । उन्होंने अपना नाम क्या बताया? देशबंधु छोड़कर, कुछ याद न रहा। उन शिक्षका की बात पर मैंने उस पल सोचा, यहाँ तो यह सुन ही नहीं रहीं हैं, वहां क्या होगा? क्योंकि मैं एडमिशन को लेकर बहुत परेशान था। उस शिक्षका की बात मैंने ठीक से न सुनी, जैसे उन्होंने मेरी बात। उस वक्त मेरे साथ एक मित्र था, उसे बहुत जल्दी थी, आई.टी.आई. हजरत निजामुद्दीन से एडमिशन फॉर्म लेने की। मैंने उसके कहा रुक यार, अभी और किसी शिक्षक से मिलते हैं। वह रुका भी, लेकिन ज्यादा न रुका। फिर मुझे लगा कि पहले इसका आई.टी.आई. में एडमिशन फॉर्म लिया जाए। जब मैं घर पंहुचा और सोचा कि मुझे उस शिक्षका से कुछ निवेदन करना चाहिए था। पता नहीं क्यों मित्र मनोज को अपने साथ ले गया, उसने मुझे हड़बड़ा दिया था।
दूसरे दिन मैं एक अन्य लड़के के साथ में देशबंधु कॉलेज पंहुचा। इस लडके से मेरी मुलाकात गली के मोड़ पर लगे उस सरकारी हैण्ड पम्प पर हुई, जहाँ से मैं प्रति-दिन पानी भरता था। वह लड़का बिहार के दरभंगा से था, उसके कुछ रिश्तेदार बदरपुर में रहते थे। उसने बताया कि वह जूलॉजी विज्ञान बी.एस.सी. में एडमिशन लेना चाहता है। जब हम दोनों देशबंधु कॉलेज पंहुचे, वहां बहुत भीड़ थी। सबसे पहले हमने फॉर्म लिया। उसे विज्ञान और मुझे हिन्दी में प्रवेश लेना था। हम पूछते-पूछते हिन्दी विभाग में आये, वहां दो लोगों से मुलाकात हुई, एक थे संजीव सर, उनके साथ एक और शिक्षक बैठे थे, मुझे न उनका नाम याद है और न शक्ल। संजीव सर का नाम भी मुझे पूरी तरह याद न था। उन्होंने मेरी मार्क्सशीट देखी और कहा तुम्हारे पास तो 12वीं में तो हिन्दी है ही नहीं, एडमिशन कैसे होगा? उन्होंने कहा-ऐसा करो तुम बीए इतिहास में ले एडमिशन ले लो। इतिहास विभाग में गया, तो वहां बेस्ट फॉर मार्क्स कम हो गए। मुझे ऐसा लगा कि यह मूछं वाले सर मेरी मदद नहीं करना चाहते, फॉर्म तो मैंने ले लिया था, कांउटर पर वापस किया। साथ में गये उस लड़के का भी एडमिशन नहीं हुआ, शायद वहां जूलॉजी विज्ञान बी.एस.सी. का विभाग ही न था। मैं दुबारा घर आ गया।
फिर मैंने और दिल्ली विश्वविद्यालय के रेगुलर में एडमिशन न लिया। वर्ष 2006-2007 तक में स्नातक हो चुका था। रोजगार की तलाश भी थी, 6 महीने एक वकील के पास और 1 वर्ष एक प्राइवेट स्कूल में बतौर शिक्षक रहा। मुझे लगा कि यह मैं क्या कर रहा हूँ। वर्ष 2008 में मैंने महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक हरियाणा में एम.ए.हिंदी में प्रवेश लिया। इसके बाद मैंने पत्रकारिता में डिप्लोमा के लिए हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, में एडमिशन लिया। इस डिप्लोमा की कक्षाएं सप्ताह में चार दिन ही लगाती थीं। इसमें कुछ शिक्षक अन्य विश्वविद्यालय/संस्थानों से बतौर अतिथि पढ़ाने आते थे। एक दिन कक्षा लेने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय से एक शिक्षक आये, मुझे लगा कि मैंने इन्हें देखा है। कक्षा समाप्त हुई, मैंने उनसे कहा-सर आपसे देशबंधु कॉलेज मुलाकात हुई थी। उन्होंने कहा-जब मैं कक्षा ले रहा था, तब मुझे भी लगा कि इसको कहाँ देखा है। फिर मैंने उन्हें बताया कि एक बार मैं आपके कॉलेज में एडमिशन के लिए आया था, परन्तु एडमिशन न हो सका। इसके बाद संजीव सर से दुबारा मुलाकात वर्ष 2013 में हुई, जब मैं किसी प्रकाशक के यहाँ काम करता था। उसी दौरान एक बार मीठापुर, बदरपुर कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के ऑफिस में भी हुई थी। संजीव सर एक बेहतरीन आलोचक हैं और किसी बात को बहुत गहराई के साथ समझते हैं। इनमें सादगी है, बेबाक ढंग से किसी बात को कहते हैं। उनसे कभी-कभार मुलाकात होती है तो मित्र की भांति मिलते हैं और बातें करते हैं। इस सप्ताह इनसे मिलकर अच्छा लगा। (संस्मरण-1 का अंश)~सैयद परवेज़

No comments:
Post a Comment