Sunday, 25 February 2018

शहरीकरण में कुपोषित और शोषित होता बचपन

~सैयद परवेज़


बदरपुर बॉर्डर से 473 नम्बर बस में चढ़ा। बस की पिछली एक खाली सीट को देखकर, वहीं बैठ गया । मैंने देखा कि मेरी दाहिनी ओर दो बच्चे और उन बच्चों के आगे की सीटों पर भी दो और बच्चे बैठे थे। उनकी उम्र लगभग 8 या 10 वर्ष की लग रही थी। यह सभी काफी मैले कपड़ों में थे। उनके साथ एक आदमी भी बैठा दिखा। उसके कपड़े भी काफी मैले थे और उसने मैली कैप भी पहनी हुई थी।

लेकिन उसने सेविंग करा रखी थी, मूछें उसकी कुछ घुमावदार थी, जिसे वह बार-बार छू रहा था। बच्चे ज्यादा कुपोषित-शोषित की प्रक्रिया में थे। उन्हें देखकर मैंने उस आदमी से पूछा-किसके बच्चे हैं?उसने कहा-दो तो मेरे हैं, दो मेरी खाला के हैं।" मैंने उससे और उन बच्चों के नाम पूछे, तब उसने अपना नाम कल्लू और बच्चों ने क्रमशः गुल्लू, गोलू, गोल्डन और जित्ते बताया। बच्चे अपना नाम बताकर हंसने लगे। मुझे लगा कि इन्होंने अपने-अपने नाम गलत बताये हैं। उस आदमी (कल्लू) से मैंने पूछा-कहां रहते हो?उसने कहा-बुढ़िया नाला’ (बुढ़िया नाला फरीदाबाद, एनटीपीसी के नज़दीक स्थित एक पुराना पुल है, जिसे लोग बुढ़िया नाला कहते हैं। मैं जब फरीदाबाद में पढ़ने लगा, तो इसके बारे में पता किया था। बुढ़िया नाला मूलतः एक ऐतिहासिक पुल है, जोकि मुगलकाल में निर्मित हुआ था। यह पुल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में भी है। इस कुछ समय पहले ख़राब थी, लेकिन अब पुल हालत कुछ बेहतर है। पहले इस पुल के ऊपर से वाहन गुजरते थे, लेकिन अब पुल के दोनों तरफ गेट लगाकर इसे बंद कर दिया गया हैपैदल यात्रियों के लिए ही पुल खुला हुआ है, वहां पर एक गार्ड भी नियुक्त दिखा। इस पुल के सन्दर्भ में कुछ किद्वान्तियां भी हैं, कुछ लोगों का मानना है कि रात में इस पुल से गुजरते वक्त खुद को लूटे या मारे जाने का भय रहता है। मेरा एक मित्र अरविन्द जो एनटीपीसी के बगल में रहता है, उसने मुझे पुल के बारे में बताया था कि एक बुढ़िया इस पुल के नीचे रहती थी, जिसके दो बेटे थे उनकी  सहायता से वह यात्रियों को लूटा करती थी।)


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खैर जो भी हो उन बच्चों के बाल कहीं-कहीं से धूमिल गोल्डन कलर में दिख रहे थे। बस के एक अन्य यात्री ने उस आदमी (कल्लू) से पूछा-इन बच्चों के बाल अजीब क्यों दिख रहे हैं। उस कल्लू ने कहा-अरे यह तो डाई कराते रहते हैं।उनमें से तीन बच्चों के बाल आगे से ज्यादा बड़े और पीछे से छोटे दिखे। लेकिन इन बच्चों की स्थिति दयनीय थी। उनके कान के अन्दर की गन्दगी, नाक, बाल, दांत, शारीरिक संरचना बिगड़ती हुई स्पष्टतः दिख रही थी। मैंने उस आदमी (कल्लू) से पूछा-क्या काम करते हो?उसने कहा-हम कोठियों की तरफ जाकर कूड़ा बीनते हैं।उसने कुछ सेक्टर के नाम भी बताये। उसने अपनी आय के बारे में भी बताया-पैसा तो बहुत है, महीने में दस हजार तो हो ही जाते हैं।तब मैंने पूछा-क्या आप इन बच्चों को स्कूल भेजते हैं।इस पर उसने कहा-भेजते थे यह सभी स्कूल से भाग आते हैं। मैंने थोड़ा क्रोधित होते हुए कहा-हद हो गई 8-10 वर्ष का बच्चा स्कूल से भाग आयेगा। तुम इन्हें समझाओ, न समझे तो दो थप्पड़ मारो, ठीक हो जायेगें। मैंने उससे आगे कहा-इन्हें तुम स्कूल भेजना ही नहीं चाहते हो। इन बच्चों के दांत गुटखा खाने की वजह से पीले व मैले पड़े हुए दिखाई दे रहे थे। उस आदमी के दांत भी वैसे ही थे, उसके मुंह से बीड़ी की बदबू तेजी से आ रही थी।

बदुरपुर मैट्रो स्टेशन के पास अकसर मैं तीन-चार और बच्चों को देखता हूँ, जो सुलोसन या अन्य नशे की चीजे़ को एक कपड़े में डालकर उसे चूसते दिखते हैं। वही बच्चे मुझे कूड़ा बीनते और भीख मांगते हुए भी दिखते हैं। उस स्टेशन पर कभी-कभी एक औरत को देखता हूँ जिसके साथ लगभग दो वर्ष का बच्चा रहता है। वह एक जगह बैठकर भीख मांग रही होती है। उसके साथ उसका बच्चा भी राहगीरों को पकड़ लेता है। उस बच्चे का मासूम चेहरा देखकर अपने बच्चे की याद आ जाती है। पर क्या उस बच्चे को पता है कि वह भीख मांग रहा है। इसी तरह दिल्ली के चौराहों पर 5-6 वर्ष का बच्चे बन्दर नाच करते हुए दिखे जा सकते हैं। मुझे उस आदमी (कल्लू) जो अपनी आय 10 हजार बता रहा था, दरअसल वह झूठ बोल रहा था। दूसरी तरफ बढ़ती महंगाई एक निम्न आय वर्ग की क्षमता से बाहर होती जा रही है।  

उन बच्चों को देखकर प्रश्न नहीं उठता कि उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जो मूलभूत जरूरत है जोकि इन्हें  नहीं मिल पा रहा है। फिर शिक्षा की बात तो बेमानी सी लगती है। वे आम आदमी जो ठेला लगाते हैं, रिक्शा चलाते हैं, दिहाड़ी मजदूरी, डोमेस्टिक वर्करी करते हैं। उनके बच्चे जब नगर निगम स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, तो वहां के शिक्षकों का व्यवहार क्या सम्मान जनक होता है? तब यह कूड़ा बीनने वालों के बच्चे वहां जाते होंगे, तो वहां से उनका भाग जाना स्वाभाविक ही लगता है। तीसरी तरफ जब मस्तिष्क को ऊर्जा यानी अन्न ही नहीं मिलेगा, तो वह सुचारू कैसे होगा। तब स्वास्थ्य की बात भी बेमानी लगती है। इधर सरकार बेघर को अस्थायी रैन बसेरा बनाकर दे देती है। क्या उस रैन बसेरे में रहा जा सकता है। क्या वहां पर रहने वाले लोग और उनके बच्चे सुरक्षित हैं? सरकार उसके स्थायी प्रबन्ध के बारे में क्यों नहीं सोचती?  

दिल्ली में रैन बसेरे जो मन्दिरों/मस्ज़िदों/दरगाहों के पास अस्थायी तौर पर बना दिये जाते हैं। वहीं पर झुग्गियां भी सड़कों को घेर कर बना ली गई हैं। नेताओं को धर्म, जाति और लव जिहाद से उभर ही नहीं पा रहे हैं। क्या इन झुग्ग्यिों और रैन बसेरों में रहने वाले लोगों के बच्चे भी उनके जैसे ही विकसित हो रहे हैं। हमें अपने देश के बचपन बचाने की परवाह क्यों नहीं दिखती? इस शहरीकरण में बहुत से बच्चे कुपोषित-शोषित हो रहे हैं। 

हम विभिन्न अखबारों में आयेदिन लापता/गुमशुदा लोगों की विज्ञाप्ति पढ़ने को मिलती थी । जो बेहद चिंता का विषय है, इस सन्दर्भ में मैंने भारत के लगभग कुछ राज्य में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6(1) के अधीन सूचना प्राप्त करने के लिएप्रथम राज्य के तौर पर उत्तर प्रदेश में गुमशुदा/लापता नाबालिक लड़के एवं लड़कियों की कितनी एफ.आई.आर. (FIR)दर्ज हैं। उन दर्ज एफ.आई.आर. में से पुलिस ने कितनों को सुलझा कर सफलता प्राप्त कीऔर कितनी अनसुलझी हैं। प्रश्न निम्म थे -

 

प्रश्न-1. वर्ष 2015-2017 तक उत्तर प्रदेश में गुमशुदा/लापता नाबालिक लड़के एवं लड़कियों की कितनी एफ.आई.आर. (FIR) दर्ज है। कृपया इसकी सूची एवं विवरण प्रदान करें।

प्रश्न-2. लापता/गुमशुदा लोगों की कितनी एफ.आई.आर. (FIR) दर्ज हैं, पुलिस ने उन दर्ज  एफ.आई.आर. में से कितनों को सुलझा कर सफलता प्राप्त की है और कितनी अनसुलझी हैं।
 
उत्तर प्रदेश से उत्तर प्राप्त हो गया है, प्राप्त जानकरी के अनुसार-

 
वर्ष 2015 में कुल गुमशुदा बच्चों की संख्या 2660 है जिसमें पूरी एफ.आई.आर. बताई गयी है, बरामद बच्चों की संख्या 1536 और शेष बच्चों की संख्या  1124 है
इसी तरह  वर्ष 2016 में कुल गुमशुदा बच्चों की संख्या 2884 है जिसमें पूरी एफ.आई.आर. बताई गयी है, बरामद बच्चों की संख्या 1689 और शेष बच्चों की संख्या  1195 है
वर्ष 2017 में कुल गुमशुदा बच्चों की संख्या 3151 है जिसमें पूरी एफ.आई.आर. बताई गयी है, बरामद बच्चों की संख्या 1609 और शेष बच्चों की संख्या  1542 है
इन तीन वर्षों में 8695 गुमशुदा बच्चों की संख्या दिखती है, प्राप्त सूचना के अनुसार  एफ.आई.आर सभी की बताई जा रही है. जिनमें से बरामद बच्चों की संख्या 4834 और शेष बच्चे जो कि लापता हैं 3861. यह सिर्फ एक राज्य का आकडा है. जो बेहद चिंता का विषय है


 

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