Tuesday, 30 January 2024

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु

सैयद परवेज़

बीते सितम्बर 2023 र्मैंने हरियाणा के सोहना जिले में स्थित धम्म सोताकेंद्र में 10 दिवसीय विपश्यना ध्यान साधना शिविर में भाग लिया था। इस केंद्र में भगवान बुद्धद्वारा खोजी गयी विपश्यना विद्या सिखाई जाती है। यह भारत से लुप्त हो चुकी एक विद्या है, जिसे सत्यनारायण गोयनका (19242013) ने बर्मा (म्यांमार) में खोजा और जनसामान्य के लिए सुलभ कराया। उन्होंने सयाजी उ बा खिनसे 14 वर्षों तक विपश्यना की शिक्षा ग्रहण की, और सन् 1969 से अपने जीवनपर्यंत, भारत सहित अनेक देशों में जाकर इस विद्या से लोगों को अवगत करवाया है। साथ ही, इस विद्या को सिखाने के लिए उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी भाषा में अपने ऑडियो और वीडियो भी तैयार किये हैं। उस धम्म सोताकेन्द्र में ध्यान साधना के सहायक आचार्य श्री आर. एन. गौतम थे, जो प्रत्येक साधकों को क्रमानुसार बुलाकर विपश्यना की विधि को समझा भी रहे थे, लेकिन उनका मुख्य कार्य, दिवगंत गुरु गोयनका के ऑडियो को चालू और बंद करना ही था। मुझे तो वह ऑडियो अपने आप में एक सशक्त एवं जीवंत-सी लगी। शिविर में आर्य मौन का कड़ाई से पालन करने की हिदायत थी।

इन दस दिनों में एक गृहस्थ व्यक्ति, भिक्षु और भिक्षुणी का जीवन जीते हुए विपश्यना साधना में रहता है। भिक्षुऔर भिक्षुणीसंस्कृत भाषा का शब्द है जिसे पाली भाषा में भिक्खुऔर भिक्खुनीकहते हैं। क्योंकि उनका वहाँ न तो अपना भोजन होता है, न ही अपना ठिकाना। वहाँ सब कुछ दूसरों का है, भिक्षु और भिक्षुणी-सा जीवन उनके अहम् भाव को खत्म करने में सहायक होता है। गुरुद्वारों की पंक्तियों में बैठकर जब मैंने एक बार लंगर चखा, वहां पर देखा कि जब तक कोई व्यक्ति अपना हाथ फैलाकर रोटी नहीं मांगता है, लंगर परोसने वाले उसे रोटी नहीं देते हैं, मुझे लगा कि यह तो भीख मांगना-सा हो गया। उस समय मैंने पता किया कि यह तो प्रसाद है, जिसे हाथ बढ़ाकर ही लेना होता है। लेकिन विपश्यना में मुझे एहसास हुआ कि इसका भाव भी व्यक्ति के अहम् भाव को समाप्त करना ही होता है।

अहम् और संदेह को खत्म करने के लिए गांधीजी अपने जंतर में कहते हैं कि तुम्हें एक जन्तर देता हूँ। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे, तब यह कसौटी अजमाओ, जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम् समाप्त होता जा रहा है।बुद्ध की परम्परा में देखें तो सत्य और अंहिसाको गांधीजी ने आत्मसात किया। उन्होंने उसे अपने जीवन का एक अंग बना लिया। विपश्यना व्यक्ति की बौद्धिकता के साथ मानवीय पक्ष को अभ्यास के माध्यम जीवन्त रखती है। अभ्यास न करने से पढ़ी हुयी बात का भूल जाना उसका स्वभाव है।

विपश्यना शिविर में जो भोजन साधक के पात्र में उपलब्ध होता है वो उसकी अपनी इच्छा जैसा नहीं होता है। सुबह साढ़े छह बजे नाश्ता, सुबह 11 बजे भोजन, शाम पांच बजे हल्का नाश्ता। इसमें हम देखते हैं कि एक साधक 12 घंटे का उपवास करता है, वो सिर्फ पानी पी सकता है लेकिन उसे भोजन सात बजे के बाद नहीं मिलेगा। जो पुराने साधक होते हैं उन्हें तो शाम के वक्त सिर्फ निम्बू पानी मिलता है।  

यहाँ आर्य मौनका पालन किया जाता है। मन में आया कि यह आर्य मौन क्या है? मौन ही पर्याप्त था। लेकिन यहाँ आकर पता चला कि मौन तो सिर्फ वाणी का होता है किंतु आर्य मौनसम्पूर्ण मौन होता है जिसमें इशारे या किसी भी संकेत तक के माध्यम से संवाद की मनाही होती है। आर्यपाली भाषा के अरियेका शब्द है जिससे बाद में वह आर्य बन गया। जबकि वर्तमान परिपेक्ष्य में आर्यशब्द का अपना अलग अर्थ है। हम देखते हैं कि समाज में एक तरफ आर्यहैं दूसरी तरफ अनार्यहैं। जैसे सवर्णहैं जो वर्ण-व्यवस्था को मानते हैं, दूसरी तरफ अवर्णहैं जोकि वर्ण-व्यवस्था को नहीं मानते हैं। उत्तराखंड में दलित समाज के वे लोग जो आर्य समाजका अनुसरण करते हैं। वे अपने नाम के साथ आर्यालगाते हैं। ध्यातव्य है कि आर्य और आर्या में भी अंतर है।




विपश्यना केंद्र में साधक/साधिकाओं के अलग-अलग शिविर हैं। वहाँ एक पगोड़ा है, जोकि एक तरफ पुरुषों तथा दूसरी तरफ महिलाओं के लिए दो भागों में विभक्त है, इसके अन्दर छोटे-छोटे कमरे हैं। यह पगोड़ा गोलाई में बना हुआ है, इसके छत के ऊपर सात लम्बी शिखर नुमा और एक कुछ बड़ी मोटी गोलाई में शिखर है। यह आठ शिखर जो अष्टांगिक (आठ अंगों वाला) मार्ग का सूचक है यानी सही दृष्टि, सही संकल्प, सही वचन, सही कर्म, सही जीविका, सही प्रयत्न, सही स्मृति, सही समाधि। पगोड़ा साधना का वो शून्यगार होता है जहाँ पर साधक-साधिका बिलकुल एकांत में साधना करते हैं।

शिविरों में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग धम्म हॉल हैं। धम्म हॉल, ध्यान करने का सामूहिक स्थल होता है। धम्म हॉल में साधक को धम्म सेवकों या सहायक आचार्य से कम शब्दों में कुछ पूछने की अनुमति होती है। धम्म सेवक भी एक साधक होता है, लेकिन वह अपनी साधना के साथ अन्य साधकों के लिए भी सेवा कार्य करता है। जैसे उनको सुबह उठाने, ब्रेक के दौरान घण्टी बजाकर धम्म हाल में आने का संकेत देना, साथ ही, भोजनालय में साधकों को भोजन, दूध आदि उनके पात्रों में देना। यदि किसी साधक को कुछ आवश्यकता है, तो वे उन्हें लिखकर देते हैं, जिनका वो प्रबन्ध करते हैं। केन्द्र में प्रत्येक साधकों के लिए अलग-अलग कमरे होते हैं, जिसमें वे विश्राम और अपनी साधना का अभ्यास करते हैं। उन्हें वहाँ भी आर्य मौन का पालन करना होता है। उन्हें किसी भी साधक से बात करने की अनुमति नहीं होती है। साधकों के लिए विपश्यना का केंद्र एक तपोभूमि होती है, जहाँ वो 9 दिनों में लगभग 110 घंटे ध्यान एवं मौन साधना करते हैं, जिससे उनमें ऊर्जा का संचार करता है। केंद्र में साधकों के लिए एक निश्चित सीमा रेखा खींची गयी है, जिसका उल्लंघन करने की मनाही थी। जिस दिन मैं वहाँ पहुंचा, शाम 6 बजे मुझे हल्का नाश्ता प्राप्त हुआ। और शाम सात बजे वहाँ की प्रबन्धक टीम से शिविर के अनुशासन, साथ ही अपने पठन और लेखन सामग्री, मंत्राभिषिक्त माला-कंठी, गंडा-ताबीज, नशीली वस्तुएं बीड़ी, तम्बाकू, कीमती सामान, मोबाइल फोन आदि को जमा करने का निर्देश मिला। साधक के रूकने, भोजन करने, और धम्म हॉल और पगोड़ा में ध्यान करने का एक निश्चित स्थान दिया गया। उस दिन, रात्रि 8 बजे से आर्य मौन के साथ ही शिविर का प्रारम्भ हो गया था।

पहले दिन की साधना में साधक अपने शरीर में प्रतिक्षण होने वाले परिवर्तन का तथागत रूप से अनुभव करने का प्रयास करता है। उसका श्वास (ब्रीथिंग) कैसे प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है। व्यक्ति को अपने श्वास पर बगैर कुछ छेड़छाड़ किये उसे अनुभव करना होता है। इस विपश्यना विद्या को आज से 2500 वर्ष पहले सिद्धार्थ गौतम ने खोज की और बुद्ध बने। ध्यातव्य है कि इस विपश्यना में साधना करने वाले को बगैर किसी ईश्वर का नाम लिए उसे अपना ध्यान सिर्फ श्वासपर केन्द्रित करना होता है, जिसे आना-पानाविधि कहते हैं। क्योंकि इसमें साधक (विद्यार्थी) जब अपनी आँखें बंद करके ध्यान की मुद्रा में बैठता है, वहाँ उसे महसूस करना होता है कि नाक के दोनों छिद्रों यानी नासिका से श्वास कब उसके अन्दर गयी और कब बाहर आई। नासिका छिद्र से श्वास दाएं या बाएँ से आई और गयी। तब हमारा मन उस श्वास पर कुछ क्षण ही टिकता है। फिर हमारा मन भूतकाल या भविष्य में खो जाता है। लेकिन आना-पानाकरते समय साधक को अपना मन केवल वर्तमान पर केन्द्रित करने की यह ‘प्रथम विधि’ है।

मन-मस्तिष्क पर नियंत्रण करना कोई आसान कार्य नहीं, क्योंकि मन चंचल एवं जंगली स्वभाव का है। दूसरी तरफ मन में बहुत सामर्थ्य होती है जिसे हम दृढ़-निश्चय कहते हैं। व्यक्ति अपने मन पर विजय प्राप्त करके इस जीवन और इस प्रकृति को समझ सकता है। श्वास कब हमारे शरीर में आई और कब बाहर गयी, श्वास बाहर निकलते समय नाक के किस सतह पर टकराई और अन्दर जाते वक्त नाक की कौन-सी सतह को छूती हुई अन्दर गयी आदि। इस प्रथम विधि में ही हम देखें, तो बहुत से लोगों का ध्यान अपने श्वास पर केन्द्रित नहीं हो पाता है। इस विधि में साधक को अपना ध्यान केन्द्रित करने के लिए किसी भगवान, किसी ईश्वर, किसी चित्र, किसी आकृति आदि पर ध्यान नहीं लगाना होता है। उदाहरणार्थ अगर इस विपश्यना की आना-पाना विधिमें ही कोई व्यक्ति एक-दो कहकर ही अपना ध्यान केन्द्रित करने लगे, कि उसके अन्दर श्वास कब आई और कब बाहर गयी, तब उसे यह कार्य बिलकुल आसान लगेगा, किन्तु इस विपश्यना विधि में ऐसा करना पूर्णतः वर्जित होता है। इस विधि में साधक को अपना पूरा ध्यान अपने श्वास के आवागमन पर ही केन्द्रित करना होता है।

इस प्रथम विधिमें ही आगे बढ़ने पर साधक को अपना ध्यान पूरे नाक पर केन्द्रित करना होता है। इसके बाद के क्रम में नाक के सिर्फ आगे वाले तिकोने कोण पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए नाक के आधार और ऊपरी ओंठ के ऊपर जिसे ओष्ठ (फिल्ट्रम) और मुस्टैश (मूछों) वाले हिस्से तक केन्द्रित किया जाता है। जिसके बाद साधक को वहाँ की संवेदना को अनुभव करना होता है, इसके बाद साधक उस संवेदना को समझने लगता है। साधक अपने ध्यान की एकाग्रता के लिए साढ़े तीन दिन तक आना-पानाविधि का अभ्यास करता है। शिविर के चतुर्थ दिन गुरुजी विपश्यना की विधि का सुत्तसाधकों को देते हैं। जिसकी प्रक्रिया दो घंटे चलती है, इसके बीच साधकों को वहां से उठना नहीं होता है। पाली भाषा में सूत्तयानी धागा, किसी किताब या किसी फाइल को चिन्हित करने के लिए इस शब्द का प्रयोग हुआ जो आज टैग के रूप में देख सकते हैं। उसी तरह बुद्ध सुत्त या अन्य विद्वानों की बात को पहले उद्धृत करने के लिए सूत्तशब्द कहा जाता था। जिसे बाद में संस्कृत भाषा में इसको सूत्रकहा जाने लगा। पाली भाषा में शिष्य गुरु से कहते हैं-गुरु जी आप हमें विपश्यना की विद्या दीजिये, इसपर गुरु पाली भाषा में ही कहते हैं कि तुम्हें विपश्यना की विद्या देता हूँ। जिसमें साधक को अपना पूरा ध्यान नाक के तिकोने हिस्से और ओष्ठ से सीधे माथे से ऊपर फोंटानेल (तालु) से जोड़ना होता है। जिसके बाद अपना पूरा ध्यान उपसर केन्द्रित रहते हुए सिर से लेकर पैर तक साधक को अपने शरीर के एक-एक अंग का निरीक्षण करना होता है। शरीर के जिस हिस्से में संवेदना समझ नहीं आ रही है। तब वहाँ दो-मिनट रूक कर उस संवेदना को समझने का निर्देश मिलता है। संवेदना उसके शरीर में धारा-प्रवाह हो रही है या नहीं। साधक अपने शरीर के किसी भी हिस्से की संवेदना को महसूस कर सकता है। बहुत से साधक अपने अंतर्मन की गहराइयों तक पहुँच जाते हैं, जब मैंने विपश्यना की तो शरीर में एक झनझनाहट और ऐसा लगा कि शरीर का एक्सरे हो रहा है। शरीर में कहीं सुखद और कहीं दुःखद अनुभव होने पर भी साधक को समता के भाव में रहना होता है। इस विधि को करते हुए साधक को अनुष्ठान का पालन करना होता है, जिसमें ध्यान की मुद्रा में बैठे होने, पैरों में दर्द आदि होने पर भी उसे सहन करना होता है।

इस पूरे विपश्यना में मैंने अनिच्चाशब्द सुना इसका अर्थ अनित्यहै जो कि सदा एक-सा हमारे जीवन में नहीं रहता है। साढ़े तीन हाथ ही काया में जो छल-कपट चलता रहा है और जो संवेदना होती है जिसका बदलते रहना उसका एक स्वभाव है। जीवन में जो भी है उसका अंत एक दिन होना निश्चित और स्वाभाविक प्रक्रिया है। विपश्यना में आचार्य सत्यनारायण गोयनका ने बुद्धम् शरणम् गच्छामि! धम्मम् शरणम् गच्छामि! संघम् शरणम् गच्छामि! को स्पष्ट किया है, यहां सिद्धार्थ गौतम की शरण में जाने का भाव नहीं है। बुद्ध का अर्थ ‘ज्ञान’ है बुद्धम् शरणम् गच्छामी का अर्थ ज्ञान की शरणमें जाना होता है। धम्म का अर्थ इस प्रकृति को समझनाहोता है। प्रकृति किसी के साथ भी भेदभाव नहीं करती है, चाहे कोई चोर हो, बेईमान हो, ईमानदार हो, आस्तिक हो या नास्तिक आदि। इन सभी को सूर्य की रोशनी, पानी, ऑक्सीजन आदि भी समान रूप से प्राप्त होता है, लेकिन उनके कर्मानुसार प्रकृति उन्हें दण्ड जरूर देती है, जिस दिन से कोई भी व्यक्ति गलत कार्य करने लगता है, उसी दिन से उसे दण्ड मिलना शुरू हो जाता है, क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। प्रकृति अपने कार्य और अपने सिद्धान्त कोई भी फेरबदल नहीं करती है। उसका सिद्धान्त हमेशा एक सा और समान रहता है। और संघ वो है जो पंचशील का पालनकरता है जैसे हिंसा न करना’, ‘चोरी न करना’, ‘झूठ न बोलना’, ‘नशा न करना’, ‘व्यभिचार न करना। जिससे प्रज्ञा का बोध होता है, प्रज्ञा का अर्थ है अपना प्रत्यक्ष ज्ञान। इसके उलटा परोक्ष ज्ञान जिसे हमने अपनी कसौटी पर नहीं उतरा है। विपश्यना के आखिरी दिन गुरु जी मैत्री विधि देते हैं-जिसमें अपने घर आस पड़ोस में लोगों के लिए, ‘तेरा मंगल मेरा मंगल हम सबका मंगल होए रे...को साधक जीवन में धारण करें। गुरु जी, अपने प्रवचन और प्रार्थना के बाद भवतु सब्ब मंगलम्कहते हैं इसका अर्थ सभी जीवों का कल्याण हो, जिसे सुनकर पुराने साधक और बाद में नए साधक साधु...साधु...कहते हैं, इसका अर्थ होता है ऐसा ही हो...ऐसा ही हो...। यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म में लोगों की मंगलकमानाएं करने के लिए उनके अनुयायी आमीन...अमीन...आमीन कहते हैं, इसका अर्थ है-ईश्वर ऐसा ही करे...ऐसा ही करे...। समझना आवश्यक है कि साधु...साधु और आमीन...आमीन कहाँ कहना है। बुद्ध ने कहा है अप्पा दीपो भवइसके लिए हमें अपना विवेक जागृत करना होता है। यह नहीं कि किसी की हत्या करनी है और हम साधु...साधु या आमीन...आमीन कहें। कुछ करने, कुछ बोलने से पहले किसी भी धर्म, सम्प्रदाय, जाति आदि के व्यक्ति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। उसके सामने वाला व्यक्ति क्या तर्कपूर्ण और न्यायपूर्ण बात कह रहा है? यह चिन्तन ही व्यक्ति में मानवीय चेतना को उत्पन्न और विस्तृत करता है।

विपश्यना के आना-पानाविधि से, साधक अपने मन के नैसर्गिक (स्वाभाविक) श्वास से आरम्भ करके, अपने शरीर में होने वाले परिवर्तन का निरीक्षण करता है। मन अपने अंतर्मन की गहराईयों तक पहुंचकर अपने पूरे शरीर का निरीक्षण करता है। और दुःखद या सुखद होने पर समता बनाये रखने पर जोर देता है। दुःख है, तो वह एक निश्चित अवधि तक समाप्त हो जायेगा और सुख है तो वो भी निश्चित अवधि तक है। मानव जीवन में दुःख होने पर व्यक्ति को व्याकुल नहीं होना चाहिए और सुख होने पर राग (घमंड) नहीं जगाना चाहिए। विपश्यना हमें ज्ञान(प्रज्ञा), शील (नैतिक आचरण) और समाधि (एकाग्रता) की ओर ले जाता है। विपश्यना को पाली भाषा में ‘विपस्सना’ कहते हैं, इसमें स्वयं को विशेष अनुभव करते हुए अपने भीतर के चित्त यानी मन को जानना होता है। इस विपश्यना विधि को करने में मानसिक रूप से कुछ दिव्यांग, शराब, बुरी लत, माइग्रेन, मानसिक रोग एवं अन्य बीमारियों से ग्रसित व्यक्ति लाभ ले रहे हैं। विपश्यना को अपने जीवन में धारण करना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि यह मानवीय धर्म की बात पर जोर देता है। अगर कोई विपश्यना की पहली विधि आना-पानाको ही धारण कर ले तो वो अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकता है। क्योंकि गुस्सा आने पर उसका श्वास तीव्र हो जाएगा, जिसे वो अनुभव कर सकता है।

एक बात और, वहां आये साधक एवं कुछ लोग मुझे बड़े ही आश्चर्य से देख रहे थे, कारण स्पष्ट था, उनमें से एक-दो ने तो पूछ भी लिया, ‘भाई साहब इस्लाम धर्मको मानने वाले तो यहां आते नहीं हैं।मैं उसकी बात को सुन ही रहा था, तभी उसने कहा, ‘वो तो अपने धर्म के प्रति बहुत कट्टर होते हैं।मुसलमानों के प्रति समाज में नकारात्मकता का प्रसार हुआ है, प्रथम तो यह है कि उनकी देशभक्ति पर संदेह करना एक आम बात बन गयी है। खैर समझना आवश्यक है कि सभी धर्मों के लोगों की सोच समान होती है। जैसे हिन्दू हैं उसी तरह मुसलमान हैं या अन्य सम्प्रदायों के लोग हैं। गुरु जी सत्यनारायण गोयनका ने विपश्यना विद्या को धर्म से अलग करके स्पष्ट किया है। कोई व्यक्ति या कोई विपश्यी यानी विपश्यना करने वाला अपने धर्म सम्प्रदाय का अनुसरण करते हुए तथागत बन जाता है, तथागत का अर्थ तर्कशील होता है वो अपने आराध्य देव को मानता है लेकिन वो इसलिए नहीं मानने लगेगा कि उसे उनसे लाभ मिले। विभिन्न सम्पदायों में द्वेष का आधार भौतिक है। विपश्यना से व्यक्ति धर्म के उस वास्तविक अर्थ को समझने लगता है किसी भी धर्म के देवता लोगों का कल्याण करना चाहते हैं न की अकल्याण।

व्यक्ति में धर्म के प्रति उसका वास्तविक विवेक जागृत होता है कि धर्म तो वैश्विक होता है, धर्म की कोई सीमा रेखा नहीं होती है। हम देखते हैं कि साम्प्रदायिकता का मूल कारण धर्म को सीमित और स्थान विशेष के आधार पर देखना भी है। धर्म तो एक हवा की तरह है, वो है इंसानियत का भला करना। और विपश्यना एक हवा है जिसे कोई भी धारण कर सकता है। दूसरी बात, विपश्यना का स्थान कोई मनोरंजन, बातचीत, व्यापार का स्थान नहीं होता है। लेकिन बहुत से ऐसे पथ भ्रष्ट लोग आकर यहाँ जीवन को समझने लगते हैं। विपश्यना एक कठिन साधना है, जोकि आज सभी के लिए उपलब्ध है। इससे व्यक्ति का मानसिक विकास, वाक् पर नियंत्रण, कर्म-प्रधान पर बल, और मानवीय चेतना में विकास हो रहा है।  

  

6 जनवरी, 2024 को नवभारत टाइम्स में प्रकाशित

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु सैयद परवेज़ बीते सितम्बर 2023 र्मैंने हरियाणा के सोहना जिले में स्थित ‘ धम्म सोता ’ केंद्र में 10 दिवस...