~सैयद परवेज़
20 अप्रैल, 2018 को मैं अपने मित्र रूबेन मिंज के साथ, जवाहर लाल नेहरू मैट्रो स्टेशन पर था, वहां
पर मैं बदरपुर और वह कश्मीरी गेट मेट्रो की प्रतीक्षा में थे. तभी लगभग एक 35 वर्षीय
लड़की हमारे पास आकर बोली, किसी ने मेरा पर्स मार लिया है। क्या आप मेरी मदद 100 रुपये
देकर कर सकते हैं? मेरे पूछने से पहले ही उसने कहा-एक व्यक्ति ने नज़फगढ़ तक मैट्रो किराया देकर
उसकी सहायता कर दी है, लेकिन उससे आगे जाने के लिए भी उसे कम से कम उसे 100 रुपये
की और जरूरत थी।
मेरे पास उस वक्त सिर्फ 100 रुपये ही थे। मैंने रुबेन से कहा क्या तुम्हारे पास कुछ पैसे बच्चे हैं, रुबेन ने भी असमर्थता व्यक्त की। हमारी असमर्थता का का मुख्यकारण था कि कुछ देर पहले ही रुबेन ने बब्लू शूज शोरुम, लोधी रोड से अपने चचेरे भाई के लिए जूता खरीदा लिया था, रुबेन को जो जूता पसन्द आया, अनुमान के अनुसार उसकी कीमत कुछ ज्यादा थी, जूता ले तो लिया था, लेकिन पैसे कम बचे थे। उसने मैट्रो स्टेश न पर ही 100 रुपये का रिचार्ज करवाया था, उसके पास कुल 20 रुपये बचे थे। मैं तो उसके साथ घूमने साथ ही गया था, लेकिन मुझे भी वहां बाबा यानी पापा के लिए एक सैंडल पसन्द आ गया था, तब मैंने भी उसे खरीद लिया। मेरे पास भी अब केवल 100 रुपये बच्चे थे, मैट्रो कार्ड पहले से ही रिचार्ज था। अगर मेरे पास खुले 50-50 रुपये भी होते तो मैं उस लड़की सहायता जरूर करता। लेकिन मैं न कर सका, मुझे इसका बेहद दुःख है और पक्षतावा भी, तभी बदरपुर की मेट्रो आ गयी. एक बार आया की जंगपुरा, वापस जाकर उसकी सहायता करूँ.
वर्ष 2015 में, जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएच.डी का फॉर्म लेने गया था, विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर ही एक मोटा ताजा व्यक्ति मिला, जिसने मुझसे कहा था कि मुझे गुड़गांव जाना है, किसी ने मेरी पॉकेट मार लिया है, तब मैंने उसे मैट्रो का किराया और निर्धारित मैट्रो स्टेशन से उसके घर तक का किराया दिया था। उसने कहा था कि मैं आपके मोबाईल का रिचार्ज कर दूंगा, मुझे पता था कि यह नहीं करायेगा, लेकिन मैंने उसे अपना मोबाईल नम्बर उसकी ईमानदारी चैक करने के लिए दिया था। खैर 20 अप्रैल, 2018 घटना से लगभग 10 दिन पहले मुझे बदरपुर बॉर्डर पर एक व्यक्ति, उसके साथ में एक महिला और एक छोटी बच्ची दिखी, मैं उनके बगल से गुज़ारा था, तभी वह आदमी मेरे पास आया और कहा कि मैं महाराष्ट्र से हूं यहां मजदूरी करता हूं ठेकेदार हमारी मजदूरी लेकर भाग गया। तब मेरे पास पैसे नहीं थे, मैंने उसे 10 रुपये दिये। जब मैंने उसे पैसे दिए तब मुझे लगा की मैं इसे पहले भी मदद कर चुका हूँ. ऐसा ही व्यक्ति मुझे यहीं पर पहले भी मिला था.
मेरे पास उस वक्त सिर्फ 100 रुपये ही थे। मैंने रुबेन से कहा क्या तुम्हारे पास कुछ पैसे बच्चे हैं, रुबेन ने भी असमर्थता व्यक्त की। हमारी असमर्थता का का मुख्यकारण था कि कुछ देर पहले ही रुबेन ने बब्लू शूज शोरुम, लोधी रोड से अपने चचेरे भाई के लिए जूता खरीदा लिया था, रुबेन को जो जूता पसन्द आया, अनुमान के अनुसार उसकी कीमत कुछ ज्यादा थी, जूता ले तो लिया था, लेकिन पैसे कम बचे थे। उसने मैट्रो स्टेश न पर ही 100 रुपये का रिचार्ज करवाया था, उसके पास कुल 20 रुपये बचे थे। मैं तो उसके साथ घूमने साथ ही गया था, लेकिन मुझे भी वहां बाबा यानी पापा के लिए एक सैंडल पसन्द आ गया था, तब मैंने भी उसे खरीद लिया। मेरे पास भी अब केवल 100 रुपये बच्चे थे, मैट्रो कार्ड पहले से ही रिचार्ज था। अगर मेरे पास खुले 50-50 रुपये भी होते तो मैं उस लड़की सहायता जरूर करता। लेकिन मैं न कर सका, मुझे इसका बेहद दुःख है और पक्षतावा भी, तभी बदरपुर की मेट्रो आ गयी. एक बार आया की जंगपुरा, वापस जाकर उसकी सहायता करूँ.
वर्ष 2015 में, जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएच.डी का फॉर्म लेने गया था, विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर ही एक मोटा ताजा व्यक्ति मिला, जिसने मुझसे कहा था कि मुझे गुड़गांव जाना है, किसी ने मेरी पॉकेट मार लिया है, तब मैंने उसे मैट्रो का किराया और निर्धारित मैट्रो स्टेशन से उसके घर तक का किराया दिया था। उसने कहा था कि मैं आपके मोबाईल का रिचार्ज कर दूंगा, मुझे पता था कि यह नहीं करायेगा, लेकिन मैंने उसे अपना मोबाईल नम्बर उसकी ईमानदारी चैक करने के लिए दिया था। खैर 20 अप्रैल, 2018 घटना से लगभग 10 दिन पहले मुझे बदरपुर बॉर्डर पर एक व्यक्ति, उसके साथ में एक महिला और एक छोटी बच्ची दिखी, मैं उनके बगल से गुज़ारा था, तभी वह आदमी मेरे पास आया और कहा कि मैं महाराष्ट्र से हूं यहां मजदूरी करता हूं ठेकेदार हमारी मजदूरी लेकर भाग गया। तब मेरे पास पैसे नहीं थे, मैंने उसे 10 रुपये दिये। जब मैंने उसे पैसे दिए तब मुझे लगा की मैं इसे पहले भी मदद कर चुका हूँ. ऐसा ही व्यक्ति मुझे यहीं पर पहले भी मिला था.
मेरी दूर के फूफा और फूफीजी कानपुर के कपड़ा खरीद कर आ
रहे थे, उन्होंने छोटे से टेलर की
दुकान से कपड़े की दुकान नयी नयी खोली थी, कानपुर स्टेशन पर ही किसी ने उनका पर्स मार
लिया था। कानुपर से उन्हें सिंगरोली, मध्य प्रदेश आना था। उन्होंने कपड़ा तो कानपुर से गाड़ी
में बुक करा दिया था। लेकिन पति-पत्नी स्टेशन पर फंस गये। उनके पास इतना पैसा भी न
था कि वे दोनों घर पहुंच सके। पति-पत्नी काफी परेशान होकर स्टेशन पर ही बैठे थे। तभी
एक रेलवे पुलिस का जवान उनके पास आया। और उनकी परेशानी का कारण पूछा, फूफाजी ने
उसे अपनी परेशानी का कारण बताया। जवान ने तुरन्त 500 रुपये फूफा को दिये। फूफा ने उस जवान का नम्बर लिया और
कहा क्या आपको हम पर विश्वास हो गया। जवान ने कहा-भाई साहब इतने दिन नौकरी करते हो
गये हैं रेलवे में । इतना अंदाजा तो हो ही गया है कि कौन झूठ और कौन सच बोल रहा
है, फूफा ने जवान का नम्बर ले लिया लिया, घर
पहुंचने पर उसके खाते में 500 रुपये जमा करा दिये।
जामिया मिल्लिया के मुख्य रोड जो होली फेमिली से निकलती हुई बाटला हाउस और आगे निकल जाती है। जामिया के दोनों हिस्सों यानी बीच में से वह सड़क निकलती है, छात्रों को एक तरफ से दूसरी तरफ जाने में डर जरूर लगता होगा, भाई मुझे तो लगता था, पत्र भी लिखकर मैं एक बार जामिया प्रशासन के पास गया था, प्रो. दुर्गा सर को भी दिखाया था, उन्होंने कहा था कुछ गलतियाँ हैं, हमने कुछ वर्ष पहले सब बे बनाने की बात कही थी, तुम अपनी पढाई करो, इस चक्कर मैं न पड़ो, लेकिन मैं पत्र को जामिया प्रशासन ने स्वीकार नहीं किया, मैं भी ज्यादा चक्कर मैं नहीं पड़ा. मेरा सुझाव था कि सड़क पत्थर की वाहन रोधक होनी चाहिए ताकि, वाहन की स्पीड को कम किया जा सके। उसी सड़क पर एक महिला, अक्सर घर से भुल जाना या पैसे खत्म हो गये के नाम पर पैसे मांगती है। मैं उसे पहचानता हूं, वह मुझे कई बार मिल चुकी है, परन्तु जब भी वह मुझे मिलती है, तब मैं उसे कुछ रुपये जरूर दे देता हूं। 100 मांगने पर 10 तो देता ही हूं।
लेकिन 20 अप्रैल, 2018 की घटना जब मैं उस महिला की मदद न सका। तो मुझे बड़ा दुःख हुआ। एक निष्कर्ष तो यह है कि मैं दानवीर की श्रेणी में ऋणात्मक रूप से नीचे हूं। इसके लिए मुझे ऐसे मौके पर पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे अपना ही घाटा क्यों न हो? चाहे आपको पैदल ही क्यों न आना पड़े। चाहे आपको उस दिन भूखा ही क्यों न रहना पड़े। हमें लोगों की सहायता करने में पीछे नहीं रहना चाहिए।
जामिया मिल्लिया के मुख्य रोड जो होली फेमिली से निकलती हुई बाटला हाउस और आगे निकल जाती है। जामिया के दोनों हिस्सों यानी बीच में से वह सड़क निकलती है, छात्रों को एक तरफ से दूसरी तरफ जाने में डर जरूर लगता होगा, भाई मुझे तो लगता था, पत्र भी लिखकर मैं एक बार जामिया प्रशासन के पास गया था, प्रो. दुर्गा सर को भी दिखाया था, उन्होंने कहा था कुछ गलतियाँ हैं, हमने कुछ वर्ष पहले सब बे बनाने की बात कही थी, तुम अपनी पढाई करो, इस चक्कर मैं न पड़ो, लेकिन मैं पत्र को जामिया प्रशासन ने स्वीकार नहीं किया, मैं भी ज्यादा चक्कर मैं नहीं पड़ा. मेरा सुझाव था कि सड़क पत्थर की वाहन रोधक होनी चाहिए ताकि, वाहन की स्पीड को कम किया जा सके। उसी सड़क पर एक महिला, अक्सर घर से भुल जाना या पैसे खत्म हो गये के नाम पर पैसे मांगती है। मैं उसे पहचानता हूं, वह मुझे कई बार मिल चुकी है, परन्तु जब भी वह मुझे मिलती है, तब मैं उसे कुछ रुपये जरूर दे देता हूं। 100 मांगने पर 10 तो देता ही हूं।
लेकिन 20 अप्रैल, 2018 की घटना जब मैं उस महिला की मदद न सका। तो मुझे बड़ा दुःख हुआ। एक निष्कर्ष तो यह है कि मैं दानवीर की श्रेणी में ऋणात्मक रूप से नीचे हूं। इसके लिए मुझे ऐसे मौके पर पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे अपना ही घाटा क्यों न हो? चाहे आपको पैदल ही क्यों न आना पड़े। चाहे आपको उस दिन भूखा ही क्यों न रहना पड़े। हमें लोगों की सहायता करने में पीछे नहीं रहना चाहिए।
