Monday, 23 April 2018

दानवीर की श्रेणी में ऋणात्मक रूप से नीचे



~सैयद परवेज़

20 अप्रैल, 2018 को मैं अपने मित्र रूबेन मिंज के साथ, जवाहर लाल नेहरू मैट्रो स्टेशन पर था, वहां पर मैं बदरपुर और वह कश्मीरी गेट मेट्रो की प्रतीक्षा में थे. तभी लगभग एक 35 वर्षीय लड़की हमारे पास आकर बोली, किसी ने मेरा पर्स मार लिया है। क्या आप मेरी मदद 100 रुपये देकर कर सकते हैं? मेरे पूछने से पहले ही उसने कहा-एक व्यक्ति ने नज़फगढ़ तक मैट्रो किराया देकर उसकी सहायता कर दी है, लेकिन उससे आगे जाने के लिए भी उसे कम से कम उसे 100 रुपये की और जरूरत थी।
मेरे पास उस वक्त सिर्फ 100 रुपये ही थे। मैंने रुबेन से कहा क्या तुम्हारे पास कुछ पैसे बच्चे हैं, रुबेन ने भी असमर्थता व्यक्त की। हमारी असमर्थता का का मुख्यकारण था कि कुछ देर पहले ही रुबेन ने बब्लू शूज शोरुम, लोधी रोड से अपने चचेरे भाई के लिए जूता खरीदा लिया था, रुबेन को जो जूता पसन्द आया, अनुमान के अनुसार उसकी कीमत कुछ ज्यादा थी, जूता ले तो लिया था, लेकिन पैसे कम बचे थे। उसने मैट्रो स्टेश न पर ही 100 रुपये का रिचार्ज करवाया था, उसके पास कुल 20 रुपये बचे थे। मैं तो उसके साथ घूमने साथ ही गया था, लेकिन मुझे भी वहां बाबा यानी पापा के लिए एक सैंडल पसन्द आ गया था, तब मैंने भी उसे खरीद लिया। मेरे पास भी अब केवल 100 रुपये बच्चे थे, मैट्रो कार्ड पहले से ही रिचार्ज था। अगर मेरे पास खुले 50-50 रुपये भी होते तो मैं उस लड़की सहायता जरूर करता। लेकिन मैं न कर सका, मुझे इसका बेहद दुःख है और पक्षतावा भी, तभी बदरपुर की मेट्रो आ गयी. एक बार आया की जंगपुरा, वापस जाकर उसकी सहायता करूँ. 
वर्ष 2015 में, जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएच.डी का फॉर्म लेने गया था, विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर ही एक मोटा ताजा व्यक्ति मिला, जिसने मुझसे कहा था कि मुझे गुड़गांव जाना है, किसी ने मेरी पॉकेट मार लिया है, तब मैंने उसे मैट्रो का किराया और निर्धारित मैट्रो स्टेशन से उसके घर तक का किराया दिया था। उसने कहा था कि मैं आपके मोबाईल का रिचार्ज कर दूंगा, मुझे पता था कि यह नहीं करायेगा, लेकिन मैंने उसे अपना मोबाईल नम्बर उसकी ईमानदारी चैक करने के लिए दिया था। खैर 20 अप्रैल, 2018 घटना से लगभग 10 दिन पहले मुझे बदरपुर बॉर्डर पर एक व्यक्ति, उसके साथ में एक महिला और एक छोटी बच्ची दिखी, मैं उनके बगल से गुज़ारा था, तभी वह आदमी मेरे पास आया और कहा कि मैं महाराष्ट्र से हूं यहां मजदूरी करता हूं ठेकेदार हमारी मजदूरी लेकर भाग गया। तब मेरे पास पैसे नहीं थे, मैंने उसे 10 रुपये दिये। जब मैंने उसे पैसे दिए तब मुझे लगा की मैं इसे पहले भी मदद कर चुका हूँ. ऐसा ही व्यक्ति मुझे यहीं पर पहले भी मिला था.   


मेरी दूर के फूफा और फूफीजी कानपुर के कपड़ा खरीद कर आ रहे थे, उन्होंने छोटे से टेलर की दुकान से कपड़े की दुकान नयी नयी खोली थी, कानपुर स्टेशन पर ही किसी ने उनका पर्स मार लिया था। कानुपर से उन्हें सिंगरोली, मध्य प्रदेश आना था। उन्होंने कपड़ा तो कानपुर से गाड़ी में बुक करा दिया था। लेकिन पति-पत्नी स्टेशन पर फंस गये। उनके पास इतना पैसा भी न था कि वे दोनों घर पहुंच सके। पति-पत्नी काफी परेशान होकर स्टेशन पर ही बैठे थे। तभी एक रेलवे पुलिस का जवान उनके पास आया। और उनकी परेशानी का कारण पूछा, फूफाजी ने उसे अपनी परेशानी का कारण बताया। जवान ने तुरन्त 500 रुपये फूफा को दिये। फूफा ने उस जवान का नम्बर लिया और कहा क्या आपको हम पर विश्वास हो गया। जवान ने कहा-भाई साहब इतने दिन नौकरी करते हो गये हैं रेलवे में । इतना अंदाजा तो हो ही गया है कि कौन झूठ और कौन सच बोल रहा है,  फूफा ने जवान का नम्बर ले लिया लिया, घर पहुंचने पर उसके खाते में 500 रुपये जमा करा दिये। 

जामिया मिल्लिया के मुख्य रोड जो होली फेमिली से निकलती हुई बाटला हाउस और आगे निकल जाती है। जामिया के दोनों हिस्सों यानी बीच में से वह सड़क निकलती है, छात्रों को एक तरफ से दूसरी तरफ जाने में डर जरूर लगता होगा, भाई मुझे तो लगता था, पत्र भी लिखकर मैं एक बार जामिया प्रशासन के पास गया था, प्रो. दुर्गा सर को भी दिखाया था, उन्होंने कहा था कुछ गलतियाँ हैं, हमने कुछ वर्ष पहले सब बे बनाने की बात कही थी, तुम अपनी पढाई करो, इस चक्कर मैं न पड़ो, लेकिन मैं पत्र को जामिया प्रशासन ने स्वीकार नहीं किया, मैं भी ज्यादा चक्कर मैं नहीं पड़ा. मेरा सुझाव था कि सड़क पत्थर की वाहन रोधक होनी चाहिए ताकि, वाहन की स्पीड को कम किया जा सके। उसी सड़क पर एक महिला, अक्सर घर से भुल जाना या पैसे खत्म हो गये के नाम पर पैसे मांगती है। मैं उसे पहचानता हूं, वह मुझे कई बार मिल चुकी है, परन्तु जब भी वह मुझे मिलती है, तब मैं उसे कुछ रुपये जरूर दे देता हूं। 100 मांगने पर 10 तो देता ही हूं। 
लेकिन 20 अप्रैल, 2018 की घटना जब मैं उस महिला की मदद न सका। तो मुझे बड़ा दुःख हुआ। एक निष्कर्ष तो यह है कि मैं दानवीर की श्रेणी में ऋणात्मक रूप से नीचे हूं। इसके लिए मुझे ऐसे मौके पर पीछे नहीं हटना चाहिए। चाहे अपना ही घाटा क्यों न हो? चाहे आपको पैदल ही क्यों न आना पड़े। चाहे आपको उस दिन भूखा ही क्यों न रहना पड़े। हमें लोगों की सहायता करने में पीछे नहीं रहना चाहिए। 


Thursday, 12 April 2018

केक मर्यादा में लगाये





मैं एक बच्चे के बर्थडे (जन्मदिन) प्रोग्राम में गया हुआ था। बर्थडे कार्यक्रम लगभग शाम के सात बजे शुरू हुआ। सर्वप्रथम केक कटा। इसके बाद जैसाकि आजकल के जन्मोत्सव आयोजनों के देखने को मिलता है। विशेषतौर पर युवा अपनी खुशी या मजाक को जाहिर करते हुए अपने दोस्तों के चेहरे पर केक लगाते हैं। इसे खुशी का एक स्वाभाविक रूप से माना भी जा सकता है। खैर केक कटने के बाद, वहां पर भी मुंह पर केक चपोरने का सिलसिला शुरू हो गया। कुछ करीबी मित्र एवं रिश्तेदार आपस में केक लगा रहे थे, कुछ दूरी बनाकर भी खड़े थे। हाकिम सिंह नामक शख्स ने अपनी करीबी (जुल्म सिंह) की पत्नी जोकि हाकिम सिंह की करीबी रिश्ते में भाभी लगती थी, उसके चेहरे पर केक लगा दिया। हाकिम सिंह ने सर्वेश्वर सिंह की पत्नी के चेहरे पर भी केक लगाया था दोनों महिलाएं ही हाकिम सिंह की भाभी लगती थीं। इसी तरह अन्य मित्र भी चेहरे पर केक की लिपा-पोती कर रहे थे। बर्थडे वाले बच्चे के पिता समशेर सिंह पर उनके मित्र संतोष पाल सिंह ने तो पूरे चेहरे पर केक मल दिया था। केक की लिपा-पोती के बाद, खाना भी शुरू हो गया। बीच में पता चला कि जुल्म सिंह और उनकी पत्नी व बच्चे प्रोग्राम से चले गये हैं। कुछ रिश्तेदार जुल्म सिंह की खोज बीन में भी लग गये थे। दूसरी तरफ डीजे का शोर था जिसपर बच्चे व युवा नाच रहे थे। उनमें कुछ लोग खाने और पीने में मस्त थे। उसी दौरान दो पुलिस कांस्टेबल के साथ जुल्म सिंह प्रोग्राम में वापस आया।
बर्थडे के आयोजक समशेर सिंह जोकि जुल्म सिंह का चचेरा भाई ही था। केक लगाने वाला हाकिम सिंह समशेर सिंह का सगा जीजा था। जब यह बात हाकिम सिंह को पता चली, तो उन्होंने सरेआम जुल्म सिंह से मांफी मांग ली और कहा-भाई साहब मैंने तो मजाक में ही भाभी को केक लगा दिया था। घर की बात है, पुलिस में कम्प्लेन न करें।
हाकिम सिंह ने आगे कहा-भाई साहब मैं गरीब ही सही, कुछ तो रिश्ते हैं ही आपके मुझसे। हाकिम सिंह की पत्नी भी रोते हुए जुल्म सिंह से मांफी मांगी। लेकिन जुल्म सिंह न तो चचेरी बहन का रोना समझ पा रहा था न ही जीजा की माफी मांगना। वह तो बस अपनी बात पर अडा हुआ, हाकिम सिंह को सजा दिलवाने पर ही तुला था।
जुल्म सिंह की पत्नी ने भी पुलिस शिकायत न करने को कहा था, परन्तु जुल्म सिंह उसे भी धमकाते हुए कह दिया-तुझे मेरे साथ रहना है की नहीं।यह सुनकर वह डर गयी थी। सबसे पहले जुल्म सिंह ने अपनी पत्नी से ही कॉल 100 पर फोन करके पुलिस को बुलवाया था। आए पुलिस कांस्टेबल यह सब माजरा देख और समझकर बड़ी हैरान व परेशान भी थे। एक पुलिस कांस्टेबल ने जुल्म सिंह को समझाते हुए कहा-देखो भाई इतनी बड़ी बात तो है नही।जुल्म सिंह ने तो पुलिस वाले से कह दिया-मैंने आपको बुलाया है, इसने मेरी पत्नी के साथ छेड़-छाड़ की है, मैं इसे  नहीं जानता और न ही मेरे ये रिश्तेदार हैं।
मैंने भी उन पुलिस कांस्टेबल से बात की। इसपर एक पुलिस वाले ने कहा-भाई औरत की कम्प्लेन है अगर औरत इस कम्प्लेन को वापस लेती है तो कोई केस नहीं बनेगा। एक पुलिस कांस्टेबल ने मुझसे यह भी कहा कि ऐसी घटना और ऐसा आदमी मैंने पहली बार देखा है, जिसे रिश्तों की समझ ही नहीं है। भाई गलती हो गयी बन्दा माफी मांग रहा है। जुल्म सिंह को समझाने-बुझाने में लगभग रात के 11 बज गये थे। पुलिस व रिश्तेदारों के समझाने पर भी जुल्म सिंह न माना। तब पुलिस हाकिम सिंह को अपने साथ पुलिस थाने में ले गई।
मैं भी उन लोगों के साथ पुलिस थाने में गया। तब रात के 1 बज गये थे। एक पुलिस कांस्टेबल ने कहा-आप लोग जुल्म सिंह से एक बार और बात कर लीजिए। मान जाए तो ठीक है।
इसके बाद मैं और कुछ अन्य लोग जुल्म सिंह के घर गये। लेकिन उसने दरवाजा ही न खोला, बहुत देर के बाद चौथी मंजिल से ही बोला-सुबह बात होगी।
इसके बाद अन्य लोगों के साथ मैं भी पुलिस थाने में आ गया। और यह माजरा पुलिस कांस्टेबल को बताया। तब पुलिस कांस्टेबल ने कहा-अब तो मामला दर्ज करना ही पड़ेगा। महिला का मामला है, अधिकारी लोग हमसे पूछेगें, भाई ग्राउण्ड में हम रहते हैं, हम जानते हैं इतनी बड़ी बात नहीं है, लेकिन  उस महिला ने पुलिस अधिकारी से पूछा तो, हमें अधिकारी को जबाब देना होगा।  
एक सब इंस्पेक्टर ने तो महिला सुरक्षा की नया कानूनी पुस्तक भी दिखाते हुए कहा-भाई निर्भया केस के बाद महिला सुरक्षा सम्बन्धी कानून बड़े सख्त हुए हैं।इसके बाद थाने में हाकिम सिंह के खिलाफ महिला छेड़छाड़ की कुछ मामूली धाराओं के साथ एफ.आई.आर. दर्ज हो गयी।
कांस्टेबल कीर्तन लाल कुछ धाराओं व फॉर्म की जानकारी के लिए एक सब इंस्पेक्टर के पास गए । सब इंस्पेक्टर ने हाकिम सिंह से गाँव, उम्र पूछा मेडिकल व अन्य फार्म भरकर कीर्तन लाल को बताया। और कहा ऐसे आगे के फार्म भरो। जब कीर्तन लाल फार्म भरने लगे तो एक शब्द लिखकर रूक जाते और मात्रा आदि पूछने लग जाते।
यह सब देखकर सब  इंस्पेक्टर भूरे सिंह ने गुस्से में कांस्टेबल कीर्तन लाल से कहा-अरे तुझे कांस्टेबल किसने बना दिया।फिर टेबल पर रखे गिलास पर नज़र दौड़ाई और अपने दराज़ से दवा की एक गोली निकाली कर खाई।  
वहां मौजूद समशेर सिंह के करीबी अंक्ल ब्रिजभान प्रसाद सिंह ने इंस्पेक्टर भूरे सिंह से कहा-देख लो साहब जमानता यहां हो जाए तो ठीक रहेगा।
इसपर भूरे सिंह ने उनसे कहा-भाई साहब कीर्तन लाल ही कुछ करेगा।भूरे सिंह ने आगे कहा-भाई समझदार हैं,  हम ही बोलते रहेंगे, आप भी तो बोलो।
ब्रिजभान सिंह बोले-साहब दो हजार से काम हो जायेगा।
इंस्पेक्टर भूरे सिंह बोले -भाई साहब कीर्तन लाल से बात करिये। 4:30 बज गये हैं, थोड़ा आराम कर लेता हूं सुबह मुझे कोर्ट भी जाना है।
बहुत देर तक कीर्तन लाल नहीं आये। तब एक कांस्टेबल से ब्रिजभान सिंह ने बात की। वह दस हजार लेकर जमानत देने पर राजी हुआ। ब्रिजभान सिंह बोले नहीं साहब पांच हजार लीजिए और छोड़िए। घर पर सब लोग परेशान हैं, हमने तो खाना भी नहीं खाया.  
कांस्टेबल कीर्तन लाल के पास ब्रिजभान सिंह गये और हाथ में पांच हजार देते हुए बोले लीजिए साहब इतना ही है।
इसी दौरान वहां एक और कांस्टेबल आ गया । कीर्तन लाल उसको देखते हुए बोले, आप लोग ऐसे ही ले जाओ। जब मैं फ़ोन करू तो हाज़िर होना है, कुछ देर के बाद आया हुआ कांस्टेबल वहां से चला गया, तब कीर्तन लाल ने कहा-भाई एस.एच.ओ. काली चरण को भी हिस्सा देना होता है।
ब्रिजभान सिंह ने अपना रक्षा मंत्रालय का आईकार्ड भी दिखाया। इस पर कीर्तन लाल ने उन्हें मना किया। ऐसे न दिखाया करो, सरकारी नौकरी में हो, कीर्तन लाल ने ब्रिजभान सिंह का आधार कार्ड लिया और बेल पेपर पर उनसे और हाकिम सिंह से हस्ताक्षर कराये।
मैंने देखा कि किस प्रकार लोग कानून का दुरुपयोग करते हैं। जरूरत है, ऐसे लोगों से बहुत दूरी बनाकर रहने की। मेरा अपना तर्क और मानना यह भी है कि जिस व्यक्ति में क्षमा करने की शक्ति नहीं, फिलिंग नहीं है, जिसमें दया नहीं है, जिसमें मानवता नहीं है, जिसे रिश्तों की कद्र नहीं है। वह इनसान होते हुए भी इनसान नहीं है। इसके साथ मेरा सुझाव यह भी है कि किसी भी व्यक्ति को केक लगाने से पहले सावधान रहे, मर्यादा में ही रहे। नहीं तो अंजाम बुरा भी हो सकता है।
इस घटना का एक दूसरा धनात्मक पक्ष यह भी है कि अगर गलती किसी से भी हुई है या की है चाहे वह अपना कितना भी करीबी सगा क्यों न हो। उसे सजा दिलवानी ही चाहिए। लेकिन वह गलती कैसी है, सजा इस पर विशेष निर्भर करता है। एक तरफ यह भी देखने को मिलता है कि बहुत-सी महिलाओं  के साथ पिता, चाचा, मामा आदि बलात् दुष्कर्म कर देते हैं, ऐसी घटनाएं घरों में होती हैं। जोकि लोग उसे घर की इज्जत के नाम पर चाहर दीवारी के अन्दर ही रखे रहते हैं, जबकि यह सरासर गलत और अमानवीय  है। गलती के खिलाफ आवाज़ को बुलन्द करना बेहद जरूरी है।
(यह सत्य घटना पर आधारित है, नाम और स्थान व पात्र में थोड़ा बदलाव है)
~सैयद परवेज     6 मार्च, 2018 को

Friday, 6 April 2018

पैसे कमाने की कला

वायलेट लाईन मैट्रो से मैं बदरपुर जा रहा था। सरिता विहार स्टेशन पहुंचने पर बैठने को सीट मिली थी। बैठने के तदोपरान्त मैंने वहां एक बीमा कम्पनी का विज्ञापन पढ़ा जो मैट्रो के अन्दर प्रचारित था। विज्ञापन कुछ यूं था कि जिन्दगी के 100 वर्ष पार करने पर भी पूर्णतः सुरक्षा लाभ। 99 वर्ष पर आठ प्रतिशत लाभ। सोचा आखिर इतने वर्षों तक जीवितों की संख्या कितनी होगी? विज्ञापन पढ़कर हंसी भी आ रही थी। मैट्रो के साथ ही पूरे बाजार तंत्र में बढ़ता पूंजीवाद देखा जा सकता है। जहां हर कोई एक दूसरे से गला काट प्रतियोगिता में है। कम्पनी के मार्केटिंग प्रबन्धन को मानना पड़ेगा। कोई भी बीमा कम्पनी एक विश्वास के साथ कागज़ ही बेचती है। मार्केटिंग में सबसे कठिन कार्य है बीमा क्योंकि यहाँ उपभोक्ता को सिर्फ एक कागल का दुकड़ा ही मिलता. उस प्रचारित विज्ञापन के सन्दर्भ में मैंने अपने बगल में बैठे एक सज्जन से बाती भी की।

उस सज्जन ने कहा-‘जीवन में सत्तर-पचहत्तर वर्ष ही ज्यादा हैं, परन्तु हमारे गांव में एक बुजुर्ग हैं, जोकि 116 वर्ष के हो चुके हैं। अब देखिए न उनके सभी बच्चे भी मर चुके हैं, लेकिन वे ठीक हैं, काम भी करते हैं।’

मैंने पूछा उन बुजुर्ग की देखभाल कौन करता है? तब उस सज्जन ने कहा-‘जी पैते वगैरह हैं न उनके।’ फिर उसने कुछ क्षण सोचते हुए कहा-‘भाई साहब ऐसा भी क्या जीना है? आदमी अपने बच्चों के सामने ही मर जाए, तभी अच्छा है।’ मैंने भी उसकी बातों में हुंकारी दी और कहा-‘आप ठीक कह रहे हैं। अब देखिए हमारे जीवन में आस-पड़ोस, स्कूल, कॉलेज आदि में मित्र व रिश्तेदार हैं। धीरे-धीरे उनमें से कुछ दशकों बाद जिनके साथ हमने बचपन, जवानी की शुरूआत की है वह मर जायेगे। जीवन का यह कटु सत्य है। इसी प्रकार हम और हमारी उम्र के लोग एक दिन मर जायेग। यदि हम जीवित रहते हैं, तब दुनिया में हमारी उम्र का कौन होगा? जिस बच्चे को हमने अपने हाथों से उठाया और खेलाया है, उसके समक्ष ही मर जाना सबसे अच्छा है।

दूसरी तरह हर कोई दुनिया में अकेला ही आया है, अकेला ही जायेगा। मुझे ज्यादा वर्षों तक जीवित रहना व्यर्थ ही लगता है। लेकिन उन व्यक्तियों की दीर्घआयु हो, जो मानवीय उत्थान के लिए कार्यरत हैं। दुनिया में ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन की कम अवधि में बड़े कार्य कर विख्यात हुए जैसे भगत सिंह। ज्यादा वर्षों तक जीवित रहना पूर्णतः व्यर्थ है।

जीवन बीमा के सन्दर्भ में उस सज्जन ने कहा-‘भाई यह बेकार की चीजे़ हैं। एक मित्र ने बहुत वर्ष पहले मुझसे कहा कि बीमा करा लो, मैंने उसकी बात न मानी। किन्तु दो हैम्बर मशीन जरूर खरीद ली।’

मैंने उससे पूछा-यह मशीन किस काम आती है? उसने कहा-‘इससे दीवार, छत, लैंटर आदि को तोड़ा जाता है। उसने आगे बताया कि वह इन मशीनों को दैनिक किराये पर देने के लिए खरीदा। एक मशीन का रोज का किराया 200 रुपये हैं। उसने यह भी कहा कि इस मशीन को छोटे-मौटे ठेकेदार व मजदूर किराये पर लेते हैं। कुछ दिनों तक कोई भी इसे किराये पर न ले गया, लेकिन जब लोगों को पता चला तो लोग उसे घर से ही ले जाते हैं। शाम को किराया और मशीन जमा करते हैं, कुछ तो महीनों-महीनों तक ले जाते हैं। उन मशीनों से मुझे अच्छी खासी आय होती है। मशीन को खरीदने की लागत से मैंने चार गुणा फायदा प्राप्त कर लिया।
उसने आगे बताया कि जब उसका यह धन्धा चल गया, तब उसने मार्बल घिसाई मशीन खरीदी। उससे भी उसे दैनिक 300 रुपये पर देता है। मैंने उससे पूछा-आपने इससे जुड़े कार्य किये होगें, तब उसने कहा कि मैंने एक भवन निर्माण ठेकेदार के यहां काम किया है, पर मैंने उसे बहुत पहले ही छोड़ दिया था। 
उसने जीवन बीमा के बारे में कहा-‘यह ठीक है, लेकिन इसमें ज्यादा पैसे फंसाना व्यर्थ है। इसमें ज्यादा पैसा फंसाकर कोई भी व्यक्ति विशेष लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। बस यह है कि अगर आप मर गये तो, शायद पैसा मिल जाए।’ उस आदमी ने आगे कहा-‘कोई सोचे कि अगर वह अपना बीमा कराने से अमीर बन जायेगा, तब उसकी सोच गलत है। अपने धन का कैसे इस्तेमाल करना है? इसकी कला व्यक्ति को आनी चाहिए। 
उसने बताया कि सन् 2001 में उसने बैंक से 40 हजार लोन लिया था। उस पैसे से ही उसने पल्ला गांव, फरीदाबार (हरियाणा) में किस्तों पर 80 गज जमीन खरीदी। उस वक्त जमीन सस्ती थी। उसने यह भी बताया कि बैंक को 30 हजार रुपये ज्यादा देने पड़े यानी कुल 70 हजार रुपये। लेकिन जब किस्त पूरी हो गई तब उसने वह जमीन बेच दी। उसने उस जमीन से तीन गुना से ज्यादा लाभ कमाया। उसने कहा कि बेची गयी जमीन से उसने 200 गज जमीन और खरीद ली। अब उसके पास चार हैम्बर मशीन और दो मार्बल घिसाई मशीन है जिसे वह दैनिक किराये पर देता है, जिससे वह अतिरिक्त आय प्राप्त कर लेता है। उसने कहा कि मशीनों में लगी पूंजी तो बरकरार है कि कोई बीमा कम्पनी क्या इतना पैसा दे सकती थी? उसने 28 हजार की दो हैम्बर मशीन को खरीदा था।

वह व्यक्ति देखने में लम्बा, उसका रंग चॉकलेटी था। उसने एक चुटिया भी रखी हुई थी। मैं तो इतना समझ ही गया था कि यह कोई ब्राह्मण है। मैट्रो स्टेशन से बाहर आने पर उसने बताया कि वह तो जैतपुर पहाड़ी में रहता है। मैंने उससे कहा कि मैं थोड़ा आगे रहता हूं, कुछ देर उसके साथ पैदल चलते हुए बातें हुईं। उसने कहा कि मैंने अपने जीवन में बहुतेरे काम किये हैं, फोटोग्राफी भी की है। मैंने पूछा की कैसी फोटोग्रामी। तब उसने बताया कि पानी से धुलाई वाली फोटोग्राफी। उसने आगे बताया कि इस काम में समय पांच-पांच घण्टे लगते थे, फिर मैंने इस काम को छोड़ दिया। उसने बताया कि इसके बाद एसी मकैनिक के रूप में काम किया। लेकिन उसमें किसी दुर्घटना में उसका एक हाथ टूट गया। फिर उसने एसी के काम को छोड़ा, क्योंकि उसके हाथ में बहुत दर्द होता था। 
मैंने पूछा कि अब आप क्या करते हैं? उसने कहा कि वह अपोलो अस्पताल में सिक्योरिटी गार्ड है। साथ ही साथ वह तो संस्कृति आचार्य भी है, वह पण्डिताई भी करता है। पण्डिताई पर मुझे एक बात याद आया कि इंडियन मैनेजमेन्ट एसोसिएशन में एक पण्डित जी हैं, जोकि वहां पर वे लाइब्रेरियन है, लेकिन पण्डिताई भी करते हैं, वह हजारो रुपये दुर्गा पूजा आदि में कमा लेते हैं। एक पण्डित ऐसे और हैं, भारतीय सामाजिक संस्थान से जो पार्ट टाईम प्रिटिंग का काम लेते हैं, वह फुल टाईम पण्डिताई करते हैं। दुर्गा पूजा में वह तो सहायक पण्डित भी रखते हैं। एक बार कि बात वे बता रहे थे कि सहायक पण्डित ऐसा मिला उनके बहुत से पैसे लेकर चम्पत हो गया। 
खैर चलते-चलते उसने मुझे सलाह भी दे डाली कि अगर आप व्यापार करना चाहते हैं तो कम पैसे में भी आप अपना व्यापार कर सकते हैं। जैस आपके पास 50 हजार रुपये हो, तो आप दो स्कूटी फाइनेंस करवाईए। और उसे किसी पिज्जा हार्ट को दे दीजिए। वह दो स्कूटी आपको महीने का 30 हजार रुपये से ज्यादा देगा। आप किस्स भी देते रहे और स्कूटी तो आपकी है ही, इसके साथ साथ आपको इनकम भी प्राप्त होगी। 
मैंने उससे पूछा-अब आप बताईए मेरी स्कूटी को पिज्जा हार्ट में कौन लगवाएगा। तब उसने कहा कि ये लीजिए मेरा फोन नम्बर, नाम भी लिखिए दिग्विजय पाण्डे। खैर कुछ भी हो उसकी आदमी में पैसे कमाने की कला जरूरी थी।

सैयद परवेज, 28 मार्च, 2018

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु

भवतु सब्ब मंगलम्...साधु साधु साधु सैयद परवेज़ बीते सितम्बर 2023 र्मैंने हरियाणा के सोहना जिले में स्थित ‘ धम्म सोता ’ केंद्र में 10 दिवस...