Thursday, 11 January 2018

बेतिया के कुछ पल

~सैयद परवेज़ 
5 जनवरी, 2017 को मैं बिहार एसएससी की परीक्षा देने के लिए बेतिया में था। परीक्षा केन्द्र पहुंचने के लिए ऑटो लिया। रास्ते में ही कुछ और भी परीक्षार्थी उस ऑटो में बैठे। उनमें कुछ ऐसे भी दिखे जिनके वाट्सएप पर एसएससी के प्रश्न-पत्र के जवाब भी आ रहे थे। उनमें से मैंने एक से बात की, उसने कहा कि भाई पैसा खर्च हुआ है। मुझे यह सब अफवाह ही लग रहा था। परीक्षा केन्द्र के बाहर भी प्रश्न-पत्र लीक होने की खबर थी। वहां उपस्थित कुछ परीक्षार्थियों से इस बाबत उनसे बातें भी हुईं। चिन्तित हुआ, सोचा वेवजह ही यहां आ गया। खैर भागवत् गीतानुसार-जो हुआ, वह अच्छा हुआ। जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा को सार्थक माना।
दूसरी तरफ परीक्षा केन्द्र भी सरस्वती शिशु विद्या मन्दिर था। ऐसे स्कूल में आना मेरे जीवन का पहला अनुभव था। क्योंकि वहां स्वयं और अन्य बच्चों के प्रति असुरक्षा, तकलीफ देह, धर्म विभेदिता की बात स्पष्टतः थी। स्कूल की दीवारों, कक्षाओं में गाय वध नहीं करना चाहिए? जयप्रकाश नारायण ने कहा आदि विद्वानों के अद्धरण लिखे थे। प्रश्न उत्पन्न है विमर्श जारी है। क्या यह सब बच्चों को बताना आवश्यक है?
परीक्षा के बाद एक चाय का ठेला देखकर रूका। वहां एक वृद्ध था जिसके पांव मैले, चप्पल टूटी, कपड़े मैले। वह एक छोटी बच्ची के साथ बैठा था। पूछने पर बताया कि उसकी पोती है। उसने मुझे प्लास्टिक के गिलास में चाय दिया। मैंने कहा-बाबा आजकल चाय कुल्हड़ में नहीं मिल रही है। उसने कहा-हम तो कुल्हड़ बनाते ही थे। अब न डिमाण्ड रही न ही लोगों का रूझान। यह प्लास्टिक तो बहुत ही हानिकारक है। वर्षों तक यह धरती में नहीं गलेगी। उसने कहा-जब लालूजी रेलमंत्री थे, तब इसका प्रचलन बढ़ा था। मैंने पूछा-बाबा क्या आप घड़े भी हैं। उसने कहा-हां जी। हम पड़ित लोग हैं। मैंने कहा-पण्ड़ित होता है बाबा, पड़ित क्या? तब उसने कहा-नहीं, तीन धागा वाला पण्ड़ित। एक धागा वाला पड़ित। आजकल लोग पड़ित को प्रजापति भी कहते हैं।
मैंने आगे पूछा-आप कहां रहते हैं? तब उसने अपना व अपने भाईयों के अच्छे खासे घर दिखाये। उसका घर तो उसके ठेले के बिलकुल पीछे तीन मंजिला था। घर देखकर लगा कि वह घर से तो गरीब नहीं लगा रहा। लेकिन वह ऐसी अवस्था में क्यूं है, कारण भी कई हो सकते हैं। दिल्ली में मैंने कुछ लोगों को देखा है, जो जानबूझकर झुग्गी में कब्जा जमाने के लिए रहते हैं। जबकि उनके दिल्ली के कॉलोनियों में प्लॉट या घर हैं। लेकिन कुछ मजबूरी में भी रहते हैं। जैसे कुछ मजबूरी में भीख मांगते हैं, कुछ पेशा बनाकर। कुछ लोगों की दीनहीन गरीब दिखने की आदत भी होती है।
बेतिया में क्या प्रसिद्ध है? बाबा तब उसने राजदेवड़ी और काली मन्दिर के बारे में बताया। राजदेवड़ी सुनकर लगा जैसे कोई मिठाई। उसके बताये अनुसार-राजदेवड़ी पहुंचा फिर सोचा कि कहां आ गया? वहां एक नव-निर्मित पार्क दिखा। पार्क के बाहर उसमें घूमने का शुल्क व दिशा-निर्देश का बोर्ड दिखा। एक पान वाले से पूछा-भाई साहब यह राजदेवड़ी क्या है? उसने बताया-राज मतलब राजा। देवड़ी मतलब किया। यानी राजा का किला। उसने बेतिया के राजा हरिन्द्र किशोर के बारे में बताया। उनके घर का टूटेफूटे कुछ अवशेष और जर्जर इमारत देखी। जिसमें बिहार सरकार का कार्यालय है। उसने काली मन्दिर के बारे में भी बताया कि किसी जमाने में राजा की रानी महल के अन्दर से ही स्नान करने तालाब जाती थी। मैंने बेतिया में एक बात अनुभव किया कि बेतिया के लोगों में महारानी जानकी कुंवर और राजा हरिन्द्र किशोर के प्रति आज भी आदर भाव है।
काली मन्दिर तालब के किनारे खड़े एक नवयुवक को देखकर। मैंने पूछा-यह मन्दिर काफी पुराना है। तब उसने बताया कि यह मन्दिर राजा हरिन्द किशोर ने बनवाया था। रानी जानकी ‘कुंवर’ के बारे में बताया। फिर उसने यह भी कहा-‘कुंवर’ वे लोग लगाते हैं, जिनका पति मर गया हो, या पत्नी मर गयी हो। उसने अपना नाम मण्टू बिहारी बताया। नाम के साथ बिहारी लिखने का तर्क दिया कि लोग स्वयं को बिहारी बताना अपमान समझते हैं, लेकिन मेरे लिए यह गर्व की बात है। हमारे शहर के प्रकाश झा भी हैं, जो बेहतरीन फिल्म निदेशक हैं। उसने बताया कि वह भोजपुरी गीत व पटकथा भी लिखता है। भोजपुरी गीत व संगीत को वृहद ऊंचाई पर ले जाना चाहता है। उसने यह भी कहा कि कुछ लोगों ने भोजपुरी संगीत को अश्लील और हंसी का पात्र बना दिया है। उसने आगे कहा कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी भी करना चाहता है। फिर उसने पूछा-क्या दलित छात्रों के प्रवेश में वहां कोई बाधा है। मैंने कहा-हर जगह कुछ लोग होते हैं, जो दलित छात्रों पर व्यंग्य कर देते है। यह तो मैंने भी सुना है, खैर घबड़ाने की कोई बात नहीं है। जितनी आरक्षित सीटें आपके लिए हैं, उससे कई गुणा ज्यादा अनारक्षित सीटें भी होती हैं। उसने कहा-हमारे यहां एस.सी. छात्रों को सिविल कहकर अपमानित किया जाता है। जैसे आर्मी वाले आम जनता को सिविल्यन कहते हैं, यानी वे आम जनता को अपने से अलग समझते हैं। उसी तरह यहां के सवर्ण हमें अपने से अलग समझते हुए सिविल कहते हैं। विमर्श यह है कि अनुसूचित जाति के साथ शोषण के हथियार, उत्पीड़ने की शब्दावली बदल रही है। किन्तु शोषण नहीं बदला है, अस्पृश्य, से लेकर चण्डाल या शूडू अब सिविल कहकर उन्हें अपमानित ही किया जा रहा है। जब मैं बेतिया से दिल्ली आया सुना कि बिहार सरकार ने बिहार कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा को रद्द कर दिया है।
चलते-चलते
बेतिया बिहार राज्य का पश्चिमी चम्पारण जिले का मशहूर शहर है। यह भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है। चम्पारण वही जगह है जहां से महात्मा गांधी ने सत्याग्रह आन्दोलन की शुरूआत की थी। बेतिया शब्द बेंत यानी छड़ी से व्युत्पन्न हुआ है। ब्रिटिश शासन के दौरान बेतिया जमीन्दारी राज की दूसरी सबसे बड़ी व्यवस्था थी।

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