“मानव विकास के लिए नहीं बल्कि मानव के लिए विकास होना
चाहिए। यह बात भारतीय सामाजिक संस्थान नई दिल्ली में
25 जनवरी 2018 को उपेंद्र बक्शी ने फादर पॉल डे ला गुरेवियेरे स्मृति व्याख्यान मे कही। श्री बक्शी ने जो दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के पूर्व
कुलपति और कानूनी विशषज्ञ हैं। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि लोकतन्त्र
पर नित-नए खतरे और संकट झेलने पड़ रहे हैं। किन्तु मोहनदास करमचंद गांधी ने शिक्षा
दी है कि हमें असहमति भी एक तरह से असहिष्णुता है। देश के हर नागरिक को अपनी बात
रखने के लिए आमरण अनशन का अधिकार है, किन्तु यह सरकार की भी ज़िम्मेदारी है कि वह
यह सोचे कि यदि कोई व्यक्ति उससे सहमत नहीं है इसलिए वह दबाव बनाने के लिए
आत्महत्या का रास्ता चुनता है तो क्या उसे ऐसा करने दिया जाना चाहिए। जिसे हम सभ्य
समाज कहते हैं वह बर्बर समाज का ही एक परिष्कृत रूप है। और सिविल सोसाइटी और एविल
सोसाइटी से ही निकली है।
एक एक्टिस्विस्ट को अपने संघर्ष को इस उम्मीद मे ही नहीं करना चाहिए कि उसे
सफलता मिलेगी बल्कि इस चाहत मे करना चाहिए कि भले इस इसमे हार है वह अपनी कोशिश से
पीछे नहीं हटेगा। जब अफ्रीका मे रंग भेद के खिलाफ नेल्सन मंडेला ने आगाज किया तो
इसमे सफलता की उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी लेकिन 27 साल के कड़े संघर्ष के बाद रंगभेद
से पूरी तरह मुक्ति मिली। एक्टिविस्त को इसलिए संघर्ष नहीं करना चाहिए कि उसे
तत्काल लाभ मिले बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी न्याय से वंचित न रह सके।
आज जब हम गरीबी की बात करते हैं तो हमे यह भी समझना होगा कि कोई पैदाइशी गरीब
नहीं होता बल्कि सरकारी नीतियां किसी को गरीब बनाता है। आधार अनिवार्यता का मज़ाक
बनाते हुए उन्होने कहा कि जिसके पास आधार नहीं है वह बिलकुल निराधार है। और इस कार्ड
के न होने से कितने ही लोगो को भुखमरी से अपनी जान तक गवानी पड़ी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सर्वोच्च
न्यायालय की वकील डॉ उषा रामानाथन ने की एवं इसका संचालन श्रेया जेसिका धान ने
किया। कार्यक्रम मे संस्थान प्रमुख डॉ डेंजिल फर्नांडीस ने अतिथि का स्वागत स्मृति
चिन्ह और स्टाल भेंट कर किया। धन्यवाद प्रस्ताव राजीव कपूर ने दिया।
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