Friday, 9 February 2018

जमरूदपुर गांव और मैं


कैलाश कालोनी मैट्रो स्टेशन के निकट जमरूदपुर नामक एक गांव है। इस गांव में वैसे मैं पहले भी दो तीन मर्तबा जा चुका हूँ। पहली दफा वर्ष 2013 में गया था। इस गांव में मेरा आकर्षण का केन्द्र बिन्दु, वहां पर स्थित दो मकबरे थे जो मुगलकालीन या लोधी वंश के हो सकते हैं, इन मकबरों के चारों ओर कब्जा दिखा, मैंने उसका फोटो भी लिया था। वे दोनों मकबरे कुछ गलियों के अंतर में स्थित हैं। मकबरे का अतिक्रमण और उसकी बदहाली का वर्णन करते हुए मैंने कुछ फोटो को फेसबुक पर उस दौरान डाला था। इतिहास को लेकर एक चिन्ता दिखती है दिल्ली समेत भारत के कई राज्यों में इस तरह की बहुत-सी इमारतें लुप्त हो रही हैं या कहे कि गुपचुप तरीके से लुप्त की जा रही हैं। इसी गांव में ही मुझे यह भी पता चला था कि यहाँ कभी ऐसे पांच मकबरे करते थे। कुछ को लोगों ने उसे तोड़कर अपने घर में मिला कर कब्ज़ा कर लिया, वर्तमान में दो मकबरें हैं, जिसे कुछ हद तक बचाया जा सकता है, लेकिन उसकी स्थिति बेहद खराब है।प्राप्त जानकरी के अनुसार यह गाँव मुस्लिम शासकों से ख़रीदा गया था कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हरियाणा के कादरपुर गाँव से आये कल्लू और बल्लू नामक व्यक्तियों ने इस गाँव को बसाया था एक व्यक्ति ने यह भी बताया कि जमरूदपुर गाँव का नाम जुमन मियां के नाम से पड़ा हैकुछ लोग कहते हैं कि यहाँ के लोगों ने आज़ादी की लड़ाई में भी भाग लिया था      





7 फरवरी, 2018 को इस जमरूदपुर गांव में जाना हुआ। इस बार का उद्देश्य अपने पड़ौसी भाई रवीन्द्र की दुकान से मुझे एक प्रैस खरीदना था। खैर मैंने तकरीबन तीन चार पंखे व  प्रैस उनकी दुकान से खरीदकर अपने कुछ मित्रों को उपहार स्वरूप दिया है। इस बार भी मुझे किसी मित्र को उपहार देना था। जब मैंने रवीन्द्र भाई को फोन किया तो वे अपनी दुकान से प्रैस लेकर जमरूदपुर गांव वाले रोड पर आ रहे थे। उन्होंने मुझे फोन पर ही कह दिया था कि तुम वापस मैट्रो से मत जाना, मैं तुम्हें कम्पनी की गाड़ी से ही घर छुड़वा दूंगा। वह मेरे साथ बस स्टैण्ड आये ताकि मुझे कार में बैठा सके। लगभग पांच-दस मिनट उनसे बातें भी हुयीं, उन्होंने कहा कि अभी डीआरएस की गाड़ी आती ही होगी। एक बार पहले भी डीआरएस के सन्दर्भ में फोन पर बात हुई थीं । तब उन्होंने कहा था यह ऐलोबेरा, टूथपेस्ट, साबुन आदि बनाने वाली कंपनी है। उसे बात करने के दौरान ही एक वैगनआर कार आ गई। उस कार पर डीआरएस का एक स्टीकर भी लगा हुआ था। रवीन्द्र भाई ने कहा परवेज को बदरपुर बॉर्डर छोड़ देना। इसके बाद रवीन्द्र भाई अपने दुकान की तरफ चले गये।
जब मैं कार की अगली सीट पर बैठते ही, मैंने चालक से पूछा-आप डीआरएस में क्या काम करते हैं? तब उसने बताया कि मैं डीआरएस कम्पनी का ऑनर (मालिक) हूँ। डीआरएस से सम्बन्धित कुछ जानकारी मुझे रवीन्द्र भाई से मिली चुकी थी। लगभग मैं यह तो जान ही गया था कि यह स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रोडक्ट बनाने वाली एक कम्पनी है। रवीन्द्र भाई ने मुझे यह भी बता दिया था कि इसमें आरसीएम में काम करने वाले राकेश रावत जी भी हैं।
राकेश रावत का नाम सुनते ही मुझे काला जी याद आये, (काला जी अब देहरादून में रहते हैं, जब भी वे दिल्ली आते हैं, मुझे फ़ोन करते हैं, कभी कभार देहरादून से भी फ़ोन करते हैं. कालजी से मेरी जान-पहचान वैसे तो नवम्बर 2006 में हुयी थी, जब मैं किसी स्कूल में पढ़ा रहा था, काला जी भी वहां पढ़ाते थे, स्कूल में मासिक वेतन का वर्णन न करूँ तो अच्छा है. उस स्कूल में पढ़ाना मेरी अज्ञानता थी या न समझी. खैर कालाजी  के घर आना-जाना हुआ. कालाजी ने बी.ए. की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से की थी. जिस स्कूल में वह पढ़ा रहे थे, वहां से  कुछ ही कदम पर उनका घर था. जब मैं पहली बार उनके घर गया, घर की हालत बेहद ख़राब थी. वहां कुछ बर्तन और कुछ डिब्बे दिखे, दीवार की परते गिर रहीं थीं, कहीं कहीं सफेदी थी, मैंने उनके घर में एक धीमी-सी दुर्गन्ध का अनुभव भी किया, शायद वह दवा का रहा होगा, उनके घर में उनकी पत्नी और एक बेटी थी, जो करीब एक वर्ष की रही होगी. एक बार तो मेरे साथ मेरा मित्र घनिष्ट जाबिर हुसैन भी उनके घर गया था, जो अभी बिहार सरकार में शिक्षक है, कालाजी की बच्ची तो देखकर मैंने उसे कुछ पैसे दिए थे, जाबिर मन ही मन मुस्कुराया और कहा आपका दिल बड़ा है, मैंने कालाजी से कभी उनके व्यकितगत जीवन से बारे में नहीं पूछा. 
उस स्कूल के ही एक दसवीं कक्षा के छात्र से मैंने कालाजी के बारे में पूछा था, जब मैं उस कक्षा में हिंदी पढ़ाने जाता था, उस छात्र से थोड़ी-सी जानकारी मुझे मिली थी. छात्र ने बताया की उनके जितने भी बच्चे हुए वे सब मर गए. उनकी पत्नी भी किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थीं, पहले काला जी किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे, कंपनी बंद हो गयी, जब काला जी से मेरी मुलाक़ात हुयी थी उनकी उम्र लगभग 50 वर्ष तो थी ही. बाद में मैंने स्कूल में पढ़ाना छोड़ दिया था. काला जी की पत्नी बहुत अच्छे स्वभाव की थीं, लेकिन वह बेहद बीमार रहती थीं. जब भी मैं उनके घर जाता था तो वे सादा चाय पिलातीं थीं, स्कूल में पढ़ाना तो मैंने छोड़ ही दिया था, एक बार उनके गाँव के ही रहने वाला एक आदनी ने मुझे फ़ोन किया, तो मैंने उन्हें हज़ार रुपये का चेक किया था, जोकि उनका ही था. फिर मेरा उनसे सम्पर्क भी टूट गया था, उधर जाना ही न हुआ. बहुत दिनों के बाद पता चला कि काला जी ने अपना घर बेच दिया है, उनकी पत्नी इस दुनिया में न रहीं. यह सुनकर बेहद दुःख हुआ था. कभी-कभार मैं उन्हें फ़ोन करता हूँ और वह भी करते हैं, फ़रवरी 2017 में उनसे एक मुलाक़ात हुयी, जोकि वे  मेरे घर आये थे, उन्हें फादर कामिल बुल्के की अंग्रेजी से हिंदी शब्दकोश चाहिए थी, इस सन्दर्भ में उन्होंने मुझे से एक बार कहा था, मैंने भी उनसे कहा था जब आप दिल्ली आयेंगे तो मैं खरीदकर शब्दकोश रखूँगा. जब वे आये तो पता ही नहीं चला कि वह कब आये, तब मैंने अपनी ही फादर बुल्के का शब्दकोश दे दिया. मैंने उनकी बच्ची के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह अपनी नानी के यहाँ रहती है, अब तो छठवीं में पढ़ती है. उन्होंने मेरे बच्चे तो पचास रुपये दिए. चाय पीने के बाद वे  बोले मैं अभी जल्दी मैं हूँ फिर आयूंगा, मैंने कहा कलाजी खाना खाकर जाते, फिर कभी मैंने उन्हें कुछ चूड़ा और नमकीन रास्ते में खाने के लिए दिया था, मैंने पूछा कालाजी अभी आप सिक्यूरिटी में ही काम कर रहें हैं. वह बोले हाँ, यहाँ से ज़मीन बेच ही दिया था, उसी पैसे से देहरादून में ले लिया है, लेकिन एक राणा नमक व्यक्ति उसे हड़पना चाहता है.) वर्ष 2007 में उम्रदराज व्यक्ति बद्ररीनारायण काला जी मेरे मित्र बन गए थे, उन्होंने मुझे आर.सी.एम. यानी राईट कांसेप्ट मार्केटिंग में खुद ही 1200 रुपये के प्रोडक्ट खरीदकर जोड़ दिया। उस समय उन्होंने कहा कि जब पैसे हो दे देना। एक बार वह मुझे ऐसे एक ऑडिटिरियम में ले गये। जहाँ बताया गया कि आर.सी एम. व्यवसाय अपनाकर कैसे गरीब आदमी अमीर बन सकता है। गरीब से अमीर बनते हुए उन्होंने मुझे कुछ आदमियों से भी मिलवाया। काला जी तीन-चार बार अन्य लोगों के साथ मेरे घर पर आते थे, ताकि वे मुझे इस व्यवसाय को समझा संकें। उनकी यह भी इच्छा थी कि मेरी आर्थिक स्थिति और बेहतर हो । उन्होंने मुझे जैसे व्यक्ति को तो जोड़ दिया था। लेकिन मुझे भी अन्य लोगों को जोड़ना था। दूसरा पहलू उनका पैसा भी वापिस मुझे उनको देना था। इसी प्रकार मेरा पडौसी भाई रवीन्द्र। उन्होंने भी वर्ष 2010 में आर.सी.एम. से जोड़ने की बात कहने लगे। उन्होंने भी समझाया। वह भी अन्य लोगों से कभी-कभार मुझे अपने घर बुलाकर मिलवा देते। मैं उन सभी से यही कहता ठीक है। लेकिन वह यह नहीं जानते थे कि मैं अपने लाभ के लिए किसी को जोड़ नहीं सकता. मैं किसी से कुछ फायदा नहीं ले सकता, कोई ऐसे-ही  जुड़ जाए तो वह दूसरी बात है, सही मायने में मैं किसी से आर्थिक लाभ नहीं ले सकता. खैर
वर्ष 2010-11 में जब मैं बदरपुर से गाजियाबाद काम करने लगा। तो वहाँ भी एक सज्जन मिले जो एलोवेरा एफएलपी से जुड़ने के लिए 600 रुपये की दवाईयाँ बेच कर मुझे जोड़ दिया। जुड़ने के बाद एक दिन वह भी ऑडिटोरियम ले गये। कुछ समय बाद इन नेटवर्किंग व्यवसाय से जुडे लोग मिले। पता चला कि कुछ नेटवर्किंग कम्पनियाँ जैसे आर.सी.एम. बन्द हो गयी है। पड़ौसी रवीन्द्र भाई जोकि आज वह अन्य नेटवर्किंग व्यवसाय के साथ जुडे हुए हैं, वह है डीआरएस। एक बार तो रवीन्द्र भाई ने भी कहा था मैंने इस इस व्यवसाय से अपने सपने पूरे किये आज मेरे पास कार है, टूर किया आदि.   
डीआरएस भी एक नेटवर्किंग व्यवसाय कम्पनी है यह तो मुझे पता चल ही गया था। सबसे बड़ी बात थी कि अब उस व्यवसाय का मालिक स्वयं मेरे साथ था कोई तीसरा या दूसरा पक्ष न था जो सही से डीआरएस के बारे में बता सके। तब मैंने उनसे पूछा लिया कि यह डीआरएस है क्या है? उन्होंने बताया कि डी से धर्मेन्द्र, आर से-राकेश और एस से संतोष। कम्पनी का पूरा नाम हुआ DRS Infracon Pvt. Ltd and DRS Life care Pvt. Ltd मैंने कहा कि आप किन-किन चीजों का निर्माण करते हैं, तब उन्होंने कहा हम 36 चीजों का निर्माण करते हैं।
फिर मैंने पूछा कि आप टूथपेस्ट, ऐलोबेरा आदि कहां से बनवाते हैं तब उन्होंने कहा कि हम उसकी ऑउटसोर्सिंग करते हैं जोकि कुछ प्रसिद्ध कम्पनियों के नाम बताये उसका टेस्ट हम करते हैं। वह हमारे मानक को पूरा करती हैं या नहीं, अभी हमारी कम्पनी छोटी हैं, विभिन्न जगहों पर अपने काम करवाने पड़ते हैं। ऐसा हमारे जैसी अनेक छोटी कम्पनियां ही नहीं करती हैं बड़ी-बड़ी कम्पनियां भी आउटसोर्सिंग करवाकर अपना काम करती हैं। ब्रॉड उनका होता है टेस्ट उनका होता है। अभी हमारी कम्पनी का प्लांट छोटा है जोकि नारायण और नोयडा में है। अभी हम अपने काम को बढ़ा रहे हैं एक तरह से पाईप लाइन बिछा रहे हैं। इसमें हमने काफी इन्वेस्टमेंट भी किया हुआ है। मुझे यह जानकार अच्छा लगा कि इसमें वही राकेश रावत भी इस कंपनी के निदेशक हैं जो घर-घर जाकर लोगों को जोड़ा करते थे, जब वह आरसीएम नेटवर्किंग कंपनी में काम करते थे, उसका भी इसी तरह का काम था या है। जब मैंने संतोष से पूछा कि आपके व्यापार (मल्टी लेवल मार्केटिंग) यानी DRS से जुड़कर कोई कैसे पैसे कमा सकता है? उन्होंने बताया कि DRS जैसी कई अन्य कंपनियां बाज़ार में हैं, जो प्रोडक्ट बनाती हैं, यह पूरा खेल उपभोक्ता बदलने का है। एक कंपनी दूसरे को बदनाम भी करती है, अगर कोई हमारे साथ जुड़ता है, अगर वह कोई दूसरे लोगों को इस व्यवसाय में जोड़ता नहीं है, हमारे व्यापर के बारे में किसी बताता नहीं है, तो उसे सिर्फ डिस्काउंट मूल्य पर हमारे प्रोडक्ट मिलेंगे जो एक तरफ से उसके लिए फायदा है, अगर उसके द्वारा अन्य लोग भी DRS के प्रोडक्ट को खरीदते हैं तो, उसका दायरा बढेगा, इस प्रकार उसे भी लाभ का कुछ हिस्सा प्राप्त होगा, जैसे उसके नेटवर्क के द्वारा DRS का प्रोडक्ट एक लाख की खरीदारी हुयी, तो यह पैसा उन लोगों में बांटा जायेगा जो उसके सम्पर्क से इससे जुड़े हैं,  संतोष जी ने यह भी बताया की इस व्यवसाय में न सुनकर हार नहीं माननी चाहिए, जो हार गया वह आगे नहीं बढ़ सकता
                                        ~सैयद परवेज़ (संस्मरण 7 February, 2018)

2 comments:

  1. परवेज़ भाई आपने यह बेहद महत्वपूर्ण जानकारी सामने लाई है। इस त्तरह की पत्रकारिता से ही हमारी पुरातात्विक और एतिहासिक सम्पदा के बचने की गुंजाइश है। उम्मीद करता हूँ की लेख बहुत लोगो द्वारा पढ़ा जाएगा।

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